प्राचीन धार्मिक एवं एतिहासिक ग्रंथों में रत्नों का उल्लेख मिलता है| मानव ने
प्राचीन काल से ही रत्नों का प्रयोग स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि के लिए किया है|
जन साधारण के मन में रत्नों
के प्रति यह धारणा और विश्वास है कि रत्नों में दैविक शक्ति विद्यमान है| जो
धारणकर्ता के दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित कर देती है|
ऋग्वेद को सबसे प्राचीन
ग्रन्थ कहा जाता है| ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में ही रत्न शब्द विद्यमान है|
अग्निमीळे
पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम|
होतारं रत्न
धातमं||
---(ऋग्वेद/१/१)
इस मन्त्र में ध्यान देने वाली बात यह है कि परमात्मा
को ‘रत्नधातम’ कहा है अर्थात् रत्नों को धारण करने वाला वह स्वयं ही है|
वस्तुतः यह स्पष्ट होता है कि रत्नों में अग्नि रश्मि के रूप में विधमान है
रत्नों में एक विशिष्ट प्रकार की
रश्मियाँ घनीभूत (concentrated) रूप में रहती हैं,जो एक ही तत्व से निर्मित दूसरे
पदार्थ में नहीं रहती उदाहरणतः समझने के लिए कोयला और हीरा को ले लें| दोनों
वैज्ञनिक की द्रष्टि में कार्बन के प्रतिरूप है, इनमे अंतर इस बात का है कि जो
रश्मियाँ हीरे में घनीभूत हो गई है वो कोयले में नहीं है| यहाँ विशेष बात यह
है-रत्न इसलिए रत्न हैं कि उनमें अपने-अपने ढंग की विशिष्ट रश्मियाँ घनीभूत हैं|
विभिन्न रत्नों को मुख्य रूप से पृथक उनके रंग ही करते हैं रंगों के पीछे भी एक विशिष्ट दर्शन भी काम करता
है
सूर्य प्रकाश को एक प्रिज्म(prism) में से गुजारने पर हमें
जो सूर्य प्रकाश मिलता है उसमे सात रंग
विद्यमान रहते है ----
V = VIOLET जामनी
I
=INDIGO आसमानी
G =GREEN हरा
Y =YELLOW पीला
O =ORANGE नारंगी
R =RED लाल
सूर्य की रश्मियाँ जब गुलाब के लाल फूल पर पढती है तो गुलाब का फूल उपर्युक्त
सात रंगो में से छह रंगो को ग्रहण कर लेता है और लाल रंग को ग्रहण न कर वापिस करके
देता है,यह वापस हुआ लाल प्रकाश हमारी आख में प्रवेश करता है फलस्वरूप गुलाब का
फूल हमें लाल दिखाई पड़ता है अतः स्पष्ट है कि --- प्रत्येक रंग की वस्तु अपने ऊपर पड़ने वाली सूर्य रश्मियों में से शेष
रंग तो ग्रहण कर लेती है और मात्र उसी रंग की रश्मि को लौटा देती है जो उसका अपना
रंग होता है
जिस वस्तु में जितना अधिक रंग होता है,वह वस्तु उतना ही अधिक अपने गुणों की
अभिव्यक्ति करेगी| रंग बाहुल्यता के आधार पर ही रत्नों का मूल्य होता है
कांच और रत्न में यही अन्तर होता है कि रत्नों में किरणें अधिक घनीभूत अवस्था
में रहती है जबकि कांच के टुकड़े में कम घनीभूत होती हैं,यही कारण है कि रत्न धारण
किये जाते है कांच नहीं|
रत्नों का जो प्रभाव हम पर पड़ता है वो उनकी प्रकाश किरणों की क्षमता पर
निर्भर करता है प्रकाश की अन्तरिक्ष(space)में निधार्रित गति १८६००मील प्रति सेकंड
है| वायु में इसकी गति अधिक कम नहीं होती, परन्तु ठोस (solid) एवं द्रव्य (liquid)
में इसकी गति धीमी और दबाब भी बदल जाता है|
प्राचीन महर्षियों एवं खगोलविदों
ने अपने अनुभव प्रयोग और दिव्यद्रष्टि द्वारा यह ज्ञात कर लिया था कि कौन सा ग्रह
किस रंग की किरण प्रस्फुटित करता है| बाद में उन्होंने इसी आधार पर ग्रहों के लिये
रत्न निर्धारित किये थे |इस बात के समर्थन आज का आधुनिक विज्ञान भी करता है|
रंग और रत्न
सूर्य का रंग लाल होता है जो की सामान्य न होकर ताम्रवर्णी होता है
इसलिए इसका रत्न माणिक्य(RUBY) है
मंगल का रंग लाल रक्तवर्णी या अंगार सद्रश होता है इसलिय इसका रत्न मूंगा(CORAL) है
बुध का रंग हरा होता है इसलिय इसका रत्न पन्ना(EMERALD) है
गुरु का रंग पीला होता है इसलिय इसका रत्न पुखराज(TOPAZ) है
शुक्र का रंग श्वेत है जो हल्की नीली आभा से युक्त है,इसलिए इसका
रत्न हीरा(DIAMORD) है
शनि का रंग काला है किन्तु गहरे नीले रंग की आभा काले रंग से मिलती-जुलती होती है इसलिए
अनेक विद्वान इसे शनि रंग भी कहते है, इसलिए इसका रत्न नीलम(SAPPHIRE) है
राहु का रंग काला है किन्तु अनेक विद्वान् इस पर हल्के भूरे रंग का
भी प्रभाव मानते है इसलिय इसका रंग गोमेद(ZIRCON) है
केतु का रंग ध्रूम वर्ण है,जो बिल्ली जैसी आँखों के सद्र्श भी कहा जा सकता
है इसलिए इसका रत्न लहसुनिया(CAT’SEYE) है
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