बुधवार, 3 दिसंबर 2025

*कामदेव*

🌸 क्या आप जानते हैं? कामदेव सिर्फ 'प्रेम' के ही नहीं, 'जीवन के सौंदर्य' के भी देवता हैं! 🌸

हम अक्सर 'काम' शब्द को केवल शारीरिक आकर्षण तक सीमित कर देते हैं। लेकिन हमारे शास्त्रों में 'काम' चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है, जिसका अर्थ है—वह हर कार्य, कामना और इच्छा जो जीवन को आनंदमय, सुखी, शुभ और सुंदर बनाती है।
और इसी 'काम' के अधिष्ठाता देवता हैं—कामदेव। आइए, जानते हैं प्रेम और सौंदर्य के इस देवता से जुड़े
 13 अनसुने रहस्य:

🏹 1. दिव्य स्वरूप: कामदेव सुनहरे पंखों वाले एक सुंदर नवयुवक हैं। उनका रथ तोते का है और ध्वजा पर मकर (मछली) का चिह्न है।
🏹 2. अनोखा धनुष-बाण: उनका धनुष मिठास भरे गन्ने का बना है, जिसकी प्रत्यंचा मधुमक्खियों की कतार है। उनके बाण लोहे के नहीं, बल्कि अशोक, कमल, चमेली और आम के सुगन्धित फूलों के बने होते हैं।
🏹 3. पाँच बाणों का रहस्य: उनके पास 5 प्रकार के बाण हैं—मारण, स्तम्भन, जृम्भन, शोषण और उन्मादन।
🏹 4. परिवार और जन्म: पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के पुत्र हैं (कुछ कथाओं में ब्रह्माजी के पुत्र भी माने गए हैं)। उनका विवाह प्रेम की देवी, 'रति' से हुआ है।
🏹 5. अनेक नाम: उन्हें अनंग (बिना अंग वाले), मदन (मत्त करने वाले), कंदर्प, मनमथ, और पुष्पधन्वा (फूलो के धनुष वाले) जैसे कई नामों से जाना जाता है।
🏹 6. प्रेम के देवता: जैसे पश्चिम में क्यूपिड और यूनान में इरोस हैं, वैसे ही सनातन धर्म में कामदेव प्रेम और आकर्षण के देवता हैं।
🏹 7. वसंत ऋतु के मित्र: वसंत पंचमी के दिन कामदेव की पूजा होती है। वसंत ऋतु उनका मित्र है, जहाँ फूलों के बाणों से हृदय प्रेम से भर जाता है।
🏹 8. कामदेव का वास: शास्त्रों के अनुसार, कामदेव यौवन, गीत, सुंदर फूल, वसंत ऋतु, चंदन, पक्षियों की मधुर ध्वनि, सुंदर वस्त्र-आभूषण और स्त्रियों के नयन, ललाट व अधरों में वास करते हैं।
🏹 9. शिव का क्रोध और 'अनंग' होना: जब शिवजी सती के वियोग में घोर तप में लीन थे, तब कामदेव ने उन पर पुष्प बाण चलाया। क्रोधित शिव ने तीसरा नेत्र खोलकर उन्हें भस्म कर दिया। बाद में रति की प्रार्थना पर शिवजी ने उन्हें 'अनंग' (बिना शरीर के) रूप में जीवनदान दिया।
🏹 10. श्रीकृष्ण से शर्त: कामदेव ने श्रीकृष्ण को भी अपने वश में करने की शर्त लगाई थी। श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया, पर उनके मन में एक क्षण के लिए भी वासना ने घर नहीं किया।
🏹 11. प्रद्युम्न रूप में पुनर्जन्म: शिवजी के वरदान अनुसार, द्वापर युग में कामदेव ने श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र 'प्रद्युम्न' के रूप में जन्म लिया।
🏹 12. रति का अद्भुत प्रेम: प्रद्युम्न के जन्म के बाद शंभरासुर उन्हें उठा ले गया। रति ने मायावती का रूप धरकर अपने ही पति (प्रद्युम्न) को पुत्रवत पाला-पोसा और बड़ा होने पर उन्हें उनकी पहचान कराई।
🏹 13. आकर्षण का 'क्लीं' मंत्र: कामदेव का बीज मंत्र 'क्लीं' (Kleem) माना जाता है। कहा जाता है कि इसका जाप आकर्षण, सौंदर्य और कांति को बढ़ाता है।


मंगलवार, 4 मार्च 2025

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सोमवार, 3 मार्च 2025

ज्योतिष का आध्यात्मिक वैज्ञानिक सामाजिक महत्व

ज्योतिष शास्त्र केवल ग्रह-नक्षत्रों की गणना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा आध्यात्मिक 🕉️, वैज्ञानिक 🔬 और सामाजिक 🌍 महत्व भी है। यह मानव जीवन को संतुलित, सुव्यवस्थित और समृद्ध बनाने में सहायता करता है। आइए इसे तीन मुख्य दृष्टिकोणों से समझें—

1. आध्यात्मिक उपयोगिता 🙏

  • ज्योतिष शास्त्र का गहरा संबंध कर्म और भाग्य से है। यह हमें हमारे पिछले कर्मों का फल समझने और वर्तमान में सही कर्म करने की प्रेरणा देता है।
  • यह हमें ध्यान 🧘, साधना, मंत्र-जप 📿, यज्ञ 🔥 आदि के लिए शुभ समय चुनने में सहायता करता है, जिससे आध्यात्मिक उन्नति होती है।
  • ज्योतिष आत्मज्ञान का माध्यम है। यह हमारे जीवन के उद्देश्य, चुनौतियों और आत्म-विकास की दिशा को स्पष्ट करता है।

2. वैज्ञानिक उपयोगिता 🔭

  • प्राचीन काल में ज्योतिष को गणित और खगोलशास्त्र का अभिन्न अंग माना जाता था। ग्रहों की स्थिति, गति और प्रभावों की गणना एक गणितीय प्रक्रिया है।
  • मौसम विज्ञान 🌦️ और कृषि 🌾 में ज्योतिष का प्रयोग किया जाता था। आज भी किसान पंचांग देखकर खेती-बाड़ी के निर्णय लेते हैं।
  • चिकित्सा ज्योतिष 🏥 (Medical Astrology) के माध्यम से यह समझा जाता है कि ग्रहों का शरीर और मन पर क्या प्रभाव पड़ता है। इससे व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक सेहत का विश्लेषण किया जा सकता है।

3. सामाजिक उपयोगिता 🤝

  • ज्योतिष हमें व्यक्तिगत और पारिवारिक निर्णय लेने में मदद करता है, जैसे— विवाह 💍, नामकरण 🍼, गृह प्रवेश 🏡, व्यवसाय 📈 आदि।
  • यह एक समाज सुधारक की भूमिका निभाता है। ज्योतिषिक उपाय जैसे दान 🤲, सेवा ❤️, मंत्र-जाप 📿 आदि से समाज में सकारात्मकता बढ़ती है।
  • मानव स्वभाव और व्यक्तित्व को समझने में सहायक है, जिससे आपसी संबंधों को मधुर बनाया जा सकता है।

🔮 निष्कर्ष

ज्योतिष शास्त्र केवल भविष्यवाणी का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। यदि इसे सही ढंग से समझा जाए और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपनाया जाए, तो यह आध्यात्मिक जागरूकता, मानसिक शांति और सामाजिक समरसता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। ✨

रविवार, 3 नवंबर 2024

नवग्रह शांति और उपाय



  • सूर्य शांति के उपाय
  • जप मंत्र :- ॐ ह्रां ह्रीं ह्रों सः सूर्याय नमः ।
  • जप संख्या :- 7000                                    
  • दान सामग्री :- गेहूं, लाल चंदन, गुड़, लाल वस्त्र, घृत, लाल वर्ण की गाय, स्वर्ण, माणिक्य, ताम्र पात्र, नारियल, लाल फल, मिष्ठान, दक्षिणा आदि ।

                                                                       

  • उपाय :-

1. तांबे की अंगूठी में माणिक्य अथवा तैयार किया हुआ सूर्य यंत्र (ताम्रपत्र पर) धारण करें ।
2. खाना खाते समय सोने अथवा तांबे के चम्मच का प्रयोग करना तथा 11 रविवार तक सूर्य स्नान करना। (जब सूर्य, जन्म कुंडली अथवा वर्ष कुंडली में अशुभ हो)
3. 108 रविवार तक ताम्र बर्तन में शुद्ध लाल चंदन मिलाकर सूर्य को अर्घ्य देकर "सूर्य कवचम्" का पाठ करें ।
4. 40 या 43 दिन तक चलते पानी में गुड़ अथवा तांबे के सिक्के बहाना शुभ होगा ।
5. सर्वप्रथम प्रातः काल उठकर स्नान उपरांत ताम्र कलश में जल, दूध, पुष्प, गंध, लाल चंदन आदि लेकर पूर्व दिशा में मुख करके गायत्री मंत्र तथा सूर्य अर्घ्य मंत्र के उच्चारण से अर्घ्य प्रदान करें।
6. रविवार को नमक से परहेज रखें तथा 11 रविवार पर्यंत केवल दही और चावल का सेवन करना चाहिए ।

चंद्रमा शांति के उपाय
जप मंत्र :- ॐ ‌श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः ।
जप संख्या :-11,000
दान सामग्री :- चावल, सफेद चंदन, शंख, कपूर, घृत, दही, चीनी, मिश्री, खीर, मोती, श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्प, श्वेत फल, चांदी, मिठाई और दक्षिणा आदि।
उपाय :-
1. चांदी के बर्तनों का प्रयोग करना एवं चारपाई के पायो में चांदी के कील ठुकवाना ।
2. सफेद मोतियों के माला अथवा चांदी की अंगूठी में मोती धारण करना।
3. शीशे के गिलास में दूध, पानी आदि पीने से परहेज रखना तथा चांदी के बर्तनों में दूध व पानी पीना शुभ होगा।
4. पानी में कच्चा दूध मिलाकर चंद्रमा का बीज मंत्र पढ़ते हुए पीपल को चढ़ाना।
5. लगातार 16 सोमवार व्रत रखकर सायं काल सफेद वस्तुओं का दान करना चाहिए तथा पांच छोटी कन्याओं को खीर सहित भोजन कराना चाहिए।
6. सोमवार को ही प्रातः काल स्नानादि करके ताम्र बर्तन में कच्ची लस्सी (जल तथा थोड़ा दूध) भगवान की मूर्ति या शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिए।
7. चंद्र कवचम् पाठ करें और यंत्र भी धारण करें
8. द्वितीया चंद्र दर्शन करें।

मंगल शांति के उपाय
जप मंत्र :- ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
जप संख्या :- 10000
दान सामग्री :- गेहूं, मसूर, रक्त वर्ण का बैल, घृत, गुड़, स्वर्ण, मूंगा, ताम्र बर्तन, कनेर के पुष्प, लाल चंदन, लाल वस्त्र, केसर, लाल फल, नारियल, मीठी चपाती, गुड़ से निर्मित रेवड़ियां, दक्षिणा आदि
नोट :- मंगल का दान युवा ब्राम्हण को करना शुभ है ।
उपाय :- जब कुंडली में मंगल शुभ एवं योग कारक होता हुआ भी फल ना करता हो तो निम्न उपाय करें -
1. तांबे की अंगूठी में मूंगा धारण करना अथवा तांबे का कड़ा पहनना।
2. मंगलवार को घर में गुलाब का पौधा लगाना तथा 108 दिन तक रात को तांबे के बर्तन में पानी सिरहाने रखकर घर में लगाए हुए गुलाब के पौधे को वही डालना।
3. मंगलवार का व्रत रखकर 27 मंगल किसी दिव्यांग को मीठा विशेषकर गुड़ से निर्मित भोजन खिलाना।
4. नारियल को तिलक करके लाल कपड़े में लपेटकर लगातार तीन मंगलवार चलते पानी में बहाएं।
5. लाल रंग की गाय अथवा कुत्ते को रोटी खिलाएं।
6. मंगलवार का व्रत रखें।
7. विवाह हेतु मंगला गौरी का व्रत लगातार 7 मंगलवार रखना चाहिए।

बुध शांति के उपाय
जप मंत्र :- ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।
जप संख्या :- 9000
नोट :- बुध ग्रह अशुभ फली हो तो भगवान विष्णु का ध्यान करके शुक्ल पक्ष के बुधवार अथवा किसी शुभ मुहूर्त में आरंभ करके जप करना चाहिए।
दान सामग्री :- मूंग, हरे फल, चीनी, हरे पुष्प, हरी इलायची, कांस्य पत्र, पन्ना, सोना, हाथी दांत, षड् रसों से युक्त भोजन, हरी सब्जियां, हरा वस्त्र और दक्षिणा आदि।
उपाय :-
1. पन्ना धारण करना चाहिए।
2. हरे रंग के पर्दे तथा वस्त्रों का प्रयोग ।(बुध अशुभ होने पर हरा वस्त्र कदापि ना पहने।)
3. बुधवार को चांदी या कांसे के गोल टुकड़े को कपड़े में लपेट कर जेब में रखें या भुजाओं के साथ बांधें ।
नोट :- यदि बुध अशुभ हो तो मूंगी सावत के सात दाने, हरा पत्थर, कांसे का गोल टुकड़ा, हरे कपड़े में लपेटकर बुधवार को चलते पानी में बहाएं तथा बहाते समय बुध मंत्र का जाप करें।
4. हरे रंग के वस्त्र किसी हिजड़े को बुधवार के दिन देना चाहिए।
5. बुधवार के दिन 6 इलायची हरे रुमाल में लपेट कर अपने पास रख कर, इलायची तुलसी सेवन करें।
6. बुध कवचम् का पाठ करें तथा बोले यंत्र धारण कर पूजन करें।

बुधाष्टमी से बुधाष्टमी तक सविधि (जवारे) कलश स्थापन करें बाद में विसर्जन करें। दोनों पक्षों में बुधाष्टमी होना चाहिए।

गुरु शांति के उपाय
जप मंत्र :- ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः।
जप संख्या :- 19000
दान सामग्री :- पीले चावल, पुखराज, चने दाल, हल्दी, शहद, पीला कपड़ा, पीले फल (आम केला), कांस्य पात्र, घोड़ा, लवण, शक्कर, घृत, धर्म ग्रंथ, स्वर्ण, पीली मिठाई तथा दक्षिणा आदि।
उपाय :-
जन्म कुंडली में बृहस्पति शुभ व योग कारक होता हुआ भी शुभ फल प्रकट ना कर रहा हो तो निम्नलिखित उपाय करें ।
1. पुखराज धारण तथा 27 गुरुवार केसर का तिलक लगाना।
2. केसर की पुड़िया पीले वस्त्र में लपेट कर अपने पास रखना शुभ होगा।
गुरु के अशुभ प्रभाव के निवारण हेतु उपाय
1. बहते पानी में बादाम एवं नारियल पीले कपड़े में लपेटकर बहाएं।
2. पीपल वृक्ष को गुरुवार एवं शनिवार को गुरु का बीज मंत्र एवं गुरु गायत्री मंत्र पढ़ते हुए जल दें।
3. वृद्ध ब्राह्मण को यथाशक्ति पीली वस्तुएं जैसे चना-दाल, लड्डू, पीला वस्त्र, शहद आदि प्रदान करें।

शुक्र शांति के उपाय

जप मंत्र :- ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः ।
जप संख्या :- 16000
दान सामग्री :- चांदी, चावल, सुवर्ण, दूध, दही, मिश्री, श्वेत चंदन, श्वेत घोड़ा, वस्त्र, पुष्प, फल, सुगंधित तथा दक्षिणा आदि।
उपाय :- कुंडली में योगकारक शुक्र फलीभूत ना हो तो उपाय करें-
1. चांदी की कटोरी में सफेद चंदन, कपूर, सफेद पत्थर सोने वाले कमरे में रखें । चंदन अगरबत्ती जलाना शुभ होगा।
2. घर तुलसी गाय श्वेत पुष्प लगवाना क्रीम रंग के रेशमी कपड़े में चांदी के चौरस टुकड़े पर शुभ यंत्र खुदवाकर विधि पूर्वक अपने पास रखें।
शुक्र अशुभ प्रभावी होने की स्थिति में उपाय
1. शुक्रवार को दुर्गा पूजन, 5 कन्या पूजन कर खीर आदि मीठा भोजन कराएं । गाय को घास प्रत्येक शुक्रवार को शक्कर चरी डालना।
2. सफेद रंग के पत्थर पर चंदन का तिलक लगाकर चलते पानी में बहा देना ।
3. चांदी पर शुक्र यंत्र को खुदवाकर रेशमी क्रीम रंग के वस्त्र में लपेटकर शुक्रवार को नीम के नीचे दबाना।
4. शुक्रवार का व्रत 5 शुक्रवार पांच कन्या पूजन विधि सहित श्वेत वस्तुएं भेंट करें।

शनि शांति के उपाय
जप मंत्र :- ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनिश्चराय नमः
जप संख्या :- 23000
दान सामग्री :- नीलम, लोहा, तिल, उड़द (मांस) ,सरसों का तेल, काला वस्त्र, गाय, फल-फूल, जूता, कुल्थी, लोह पात्र, भैंस, कस्तूरी, सुवर्ण, नारियल ।
उपाय :- शनि शुभ होता हुआ भी शुभ फल प्रकट ना कर रहा हो तो निम्न उपाय शुभ होंगे।
1. स्वर्ण, मुद्रिका में धारण करें नीलम अथवा नाव की कील की अंगूठी अथवा काले घोड़े की नाल अंगूठी बनवा कर मध्यमा अंगुली में पहने।
2. घर में नीले रंग के पर्दे तथा चादर का प्रयोग तथा नीले वस्त्रों का प्रयोग करें।
जब कुंडली में शनि नीच अनिष्ट कर हो तो उपाय
1. शनिवार का व्रत करें तथा शनि स्त्रोत्र का पाठ करें।
2. स्टील की कटोरी में तेल का छाया पात्र करके तेल पांच शनिवार तक आक के पौधे पर अथवा शनि मंदिर में डालना शुभ होगा, तेल चढ़ाते समय बीज मंत्र पढ़ें।

राहु शांति के लिए उपाय
जप मंत्र :- ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।
जप संख्या :- 18000
दान सामग्री :- सप्त धान्य (गेहूं उड़द मूंग चने जौं कंगनी और चावल), गोमेद, सीसा, काला घोड़ा, तिल, तेल, सोने या चांदी का सर्प, उड़द, खड्ग (तलवार), कवच, नीला वस्त्र, काला पुष्प, नारियल, दक्षिणा आदि।
उपाय :-
1. काले या नीले वस्त्रों से परहेज करें तथा चांदी की चेन आदि धारण करना शुभ होगा।
2. चपाती को खीर लगा कर कौओं अथवा काली गाय को खिलाएं।
3. काला तिल तथा कच्चा कोयला नीले रंग के ऊनी कपड़े में बांधकर शनिवार अथवा राहु के नक्षत्रों में (आर्द्रा, स्वाति, शतभिषा) घर के आंगन में दबाना शुभ होगा।
4. कोयला, जवा, श्रीफल बहाएं।

केतु शांति के उपाय
जप मंत्र :- ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः।
नोट :- जन्म अथवा वर्ष कुंडली में केतु अशुभ फल कारी होने पर यह मंत्र जाप शुभ मुहूर्त में करें।
जप संख्या :- 17000
दान सामग्री :- लहसुनिया, लोहा, बकरा, नारियल, सप्तधान्य (गेहूं उड़द मूंग चने जौं कंगनी और चावल), धूम्र (कत्थई) वस्त्र, कस्तूरी, लोहा, चाकू, कपिला, गाय, दक्षिणा सहित दान करें।
उपाय :-
1. केतु शांति हेतु श्री गणेश चतुर्थी व्रत रखें।
2. काले वस्त्र में तिल बांधकर बहाएं।
3. रंग बिरंगी (चितकबरी) गाय की सेवा करना एवं रंग-बिरंगे कुत्तों को दूध-ब्रेड डालना।



मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

सात वारों के व्रत-विधि विधान

(१). रविवार व्रत विधि - रविव्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार प्रारंभ करें तथा १ वर्ष पर्यन्त अथवा ३० या १२ व्रत करना चाहिये। इस दिन भोजन में गेहूँ की रोटी अथवा गेहूँ का दलिया अथवा इनसे बना सीरा हलवा-गुड घी इलायची सहित बना सेवन करें। भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करें। भोजन सूर्यास्त से पहले करें तथा भोजन के पूर्व इस हलवा का कुछ भाग देवस्थान अथवा बालक बालिका को देकर भोजन करें। प्रथम हलवा सेवन करें फिर अन्य पदार्थ सेवन करें प्रात: स्नान करके रक्त चन्दन का तिलक करें तथा रोली, अक्षत, लाल पुष्प मिश्रित जल से सूर्यनारायण को जलांजलि श्रद्धापूर्वक प्रदान करें। अन्तिम रविवार को हवन क्रिया के बाद योग्य दम्पत्ति को भोजन कराकर लाल वस्त्र एवं यथेच्छा दक्षिणा प्रदान करें। व्रत के दिन लाल रंग का बनियान या वस्त्र धारण करना योग्य तथा ॐ हां ह्रीं ह्रौं स: इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जप करना भी योग्य है। हवन समिधा अर्क-आंकड़ा यह व्रत आयु-सौभाग्य-समस्त कामना सिद्धि-चर्मनेत्र आदि विकार नाशक हैं।


(२). सोमवार व्रत विधि - यह व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण या कार्तिक मार्गशीर्ष के मास से धारण करना योग्य है। तथापि किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से प्रारंभ करें तथा १० या ५४ व्रत करें। भोजन में दही, दूध-चावल अथवा खीर के प्रथम ७ ग्रास खावें फिर अन्य पदार्थ सेवन करें भोजन के पूर्व किसी विद्यार्थी को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का यथेच्छा अनुदान करें तथा भोजन सूर्यास्त बाद करना समुचित, इस दिन सफेद रंग के वस्त्रादि धारण करना चाहिए। प्रात: स्नान के बाद चन्दन का तिलक लगावें। तथा शिवालय के दर्शन दीप ज्योति सुगंध अर्पण आदि कार्य भी समुचित है । ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य है। अन्तिम सोमवार को हवन क्रिया के बाद बालक- विद्यार्थी को खीर सहित भोजन करावें। हवन समिधा पलाश तथा दक्षिणा स्वरूप चांदी अथवा सफेद वस्त्र देवें। यह व्रत व्यापार में लाभप्रदायक एवं मानसिक कष्ट विकारों के नाश हेतु फल प्रदायक है।

(३) मंगलवारव्रत विधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से प्रारंभ करें तथा २१ या ४५ व्रत करें। भोजन में गेहूँ के आटे गुड घी से बना हलवा एवं मोदक लड्डुओं का ५-७ ग्रास लेवें फिर यथेच्छा पदार्थ सेवन करें। परन्तु नमक का सेवन करना योग्य नहीं है। ये सेवनीय पदार्थ किसी बैल-पशु को खिलाकर भोजन करना भी योग्य है। इस दिन श्री हनुमानजी के मन्दिर में तैल का दीपक प्रदान करना भी योग्य तथा लाल पुष्प की माला अर्पण करना एवं श्रीफल अर्पण करना भी योग्य है तथा श्री हनुमान चालीसा- हनुमानाष्टक- बजरंग बाण के पाठ भी श्रद्धानिष्ठापूर्वक करना समुचित है एवमेव ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य । अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद बालक विद्यार्थी को लड्डुओं से भोजन करावें हवन समिधा खदिर-खैरकाष्ठ तथा दक्षिणा स्वरूप लाल वस्र, ताम्रपत्र, गुड, नारियल आदि का अनुदान योग्य । यह व्रत ऋण निवारक आर्थिक समस्या का समाधान सूचक एवं सन्तति सौख्य प्रदायक एवं आत्मशक्ति तत्व का विकास सूचक है

(४) बुधवारव्रतविधि-यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार से प्रारंभ तथा २१ या ४५ व्रत करें। भोजन में हरे मूंग की दाल चावल की खिचड़ी, मूँग का हलवा, हरे मूंग की पकौड़ी ४-५ ग्रास लेवें, अन्य पदार्थ बाद में सेवन करें। भोजन करने के पूर्व ५ - ७ तुलसी पत्र गंगाजल या शुद्धजल के साथ सेवन करें। इन्हीं सेवनीय वस्तु का किसी अपंग अंगहीन को भोजन के पूर्व अनुदान करना भी योग्य है। इस दिन हरे रंग का बनियान या वस्त्र धारण करें तथा ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य है। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद अंगहीन अथवा भिक्षुक को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का ही भोजन करावें, हवन समिधा अपामार्ग आंधीझाड़ा तथा दक्षिणास्वरूप कांसे का पात्र, २ फल, हरा रुमाल वस्त्र, मूंग आदि का अनुदान करें। यह व्रत विद्या-बुद्धिवर्द्धक तथा व्यापार वृद्धि का सूचक है। इस दिन श्री गणेशजी के देवस्थान पर दर्शन तथा १ पावमोदक का प्रसाद अर्पण करना एवं गाय को हरी घास खिलाना भी योग्य है।

(५) गुरूवारव्रतविधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार से प्रारंभ करें तथा ३ वर्ष या १ वर्ष अथवा १६ संख्या के व्रत करने का विधान है। इस दिन कुछ‌ हल्दी मिश्रित जल से स्नान करें तथा केसर या हल्दी का तिलक लगावें। तथा पीले रंग का बनियान या वस्त्र धारण करें। भोजन में चने की दाल से बने पदार्थ हलवा मोदक केशरिया चावल आदि पदार्थ प्रथम ७ ग्रास लेवें, अन्य पदार्थ बाद में लेवें। इन्हीं वस्तु का किसी पीली गाय को अथवा विद्यार्थी एवं अध्यापक को अनुदान करना भी योग्य है। इस दिन केले के वृक्ष की पूजा दर्शन, जल प्रदान करना भी समुचित तथा जल में कुछ हल्दी सरसों मिलाकर जल प्रदान करें तथा ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरूवे नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद बालक-विद्यार्थियों को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का भोजन करावें । हवन समिधा अश्वत्थ-पीपल काष्ठ तथा दक्षिणास्वरूप स्वर्ण, पीतल पात्र, पीले वस्त्र-रूमाल, पीला चन्दन गट्टा, चने की दाल, हल्दी आदि का यथाशक्ति अनुदान करें। यह व्रत विद्या बुद्धि प्रदाता तथा उत्तम स्थान पद प्रदायक, धन सम्पदा की स्थिरता हेतु एवं दाम्पत्य सौख्य, सन्तति सुख, यशवृद्धि सूचक है

(६) शुक्रवार व्रत विधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार प्रारंभ करें तथा २१ या ३१ व्रत करने का विधान है इस दिन स्नान के बाद शुद्ध सफेद वस्त्र से ही पहनें यथासंभव सफेद वर्ण की गाय के दर्शन तथा सर्वप्रथम १ या २ कन्या के दर्शन करें तथा श्रीफल नारियल देवें। भोजन में दूध, दही, चावल, खीर, घी, साबूदाना, सफेद मावा मिष्ठान, केला, ज्वार, गेहूँ की रोटी आदि सफेद वस्तुमात्र सेवन करना ही योग्य है तथा अन्य पदार्थ सेवन करना समुचित नहीं। तथा ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप करें रात्रिशयन सफेद चादर पर ही करें तथा भक्तिसंगीत श्रवण पठन मनन करते शयन करें। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद ६ कन्याओं को उपरोक्त वस्तुओं का भोजन करावें तथा दक्षिणास्वरूप सफेद वस्त्र रूमाल, श्रृंगारिक वस्तु, चाँदी का यथाशक्ति अनुदान एवं किसी एकाक्षि (एक आँख वाले) व्यक्ति को भी ये अनुदान योग्य है। हवन समिधा गूलर-उदम्बर मान्य । यह व्रत अविवाहित स्त्री-पुरूष हेतु मनोकामना सिद्धि प्रदायक तथा दाम्पत्य सुख विवर्धक है एवं मांगलिक कार्य समाधान बनें। स्त्री-पुरुष एवं कुमार-कुमारी सभी वर्ग हेतु यह व्रत फलदायक है।

(७) शनिवार व्रत विधि - किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से प्रारंभ करें तथा १९, ३१ या ५१ व्रत करने का विधान है। इस दिन स्नान के बाद तेल का अनुदान करना योग्य है तथा १ लोटा जल में कुछ काले तिल, लोंग, दूध, शक्कर आदि मिलाकर पीपल अथवा शमी-खेजड़ा के वृक्ष के दर्शन करते पश्चिम दिशा की तरफ मुख रखते जल प्रदान करें। भोजन में उड़द दाल से बने पदार्थ तथा विविध फल विशेषकर केला एवं तेल से निर्मित पदार्थ का सेवन प्रथम ५-७ ग्रास तक लेवें अन्य पदार्थ बाद में लेवें। इन्हीं वस्तु का अनुदान इस दिन किसी काले कुत्ते-भिक्षुक या निर्धन को देवें। काले रंग का बनियान धारण करें तथा ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः इस बीज मंत्र का मानसिक जाप यथेच्छा करें। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद यथाशक्ति तेल, तिल, छतरी, जूता, कम्बल, नीला काला वस्त्र, लोहा-कुर्सी, तिल के मोदक का अनुदान निर्धन व्यक्ति को करें विशेषकर कबूतरों को दाना तथा चीटियों के बिल पर आटा डालना भी समुचित। हवन समिधा शमी-खेजड़ा। काले घोड़े की नाल अथवा नौका के कील से साधित मुद्रिका धारण करना भी समुचित है। यह व्रत विविध सांसारिक विकार-विवाधा-अनिष्ट एवं शत्रु विनाशक है। यह व्रतादिक नियामक स्वानुभवगत तथा विविध शास्त्र नियामक से अंकित किया गया है। ग्रन्थान्तर भेद से स्वल्पान्तर नियामक हेतु अन्यथा विचार नहीं लेवें तथापि सभी नियामक में यथा देशकाल स्थिति अनुसार व्यवहार कर्तव्यता समुचित है। परन्तु भोजन में भक्ष्य पदार्थ वस्त्र धारण अनुदान आदि का नियामक पूर्णतया परिपालन योग्य समझें।

रविवार, 29 मार्च 2020

माँ सिद्धिदात्री

माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं।नवरात्र के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।मान्यता है कि इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है।इनका वाहन सिंह है और यह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं।नवरात्र में यह अंतिम देवी हैं। हिमाचल के नंदापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है।माना जाता है कि इनकी पूजा करने से बाकी देवीयों कि उपासना भी स्वंय हो जाती है।
यह देवी सर्व सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी हैं।इनकी कृपा से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से संभव हो जाते हैं। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां होती हैं। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।
कहते हैं भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिव जी का आधा शरीर देवी का हुआ था।इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर  नाम से प्रसिद्ध हुए।
इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है।
विधि-विधान से नौंवे दिन इस देवी की उपासना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है| मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करनी चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।
मंत्र:   सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
   सेव्यमाना सदा भूयाात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

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माँ महागौरी

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी' यानी इनकी आयु आठ साल की मानी गई है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। इनकि चार भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए इनको वृषारूढ़ा भी कहा गया है|
इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपर वाले बांए हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है।पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। इसी कारण से इनका शरीर काला पड़ गया लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिमय बना दिया। उनका रूप गौर वर्ण का हो गया। इसीलिए यह महागौरी कहलाईं|यह अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।
एक और मान्यता के अनुसार एक भूखा सिंह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी ऊमा तपस्या कर रही होती है। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गई, लेकिन वह देवी के तपस्या से उठने का प्रतीक्षा करते हुए वहीं बैठ गया। इस प्रतीक्षा में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आ गई। उन्होने द्याभाव और प्रसन्न्ता से उसे भी अपना वाहन बना लिया क्‍योंकि वह उनकी तपस्या पूरी होने के प्रतीक्षा में स्वंय भी तप कर बैठा।
कहते है जो स्त्री मां की पूजा भक्ति भाव सहित करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वंय करती हैं। इन्हें अन्नपूर्णा, ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी भी कहा जाता है।
मंत्र:    श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
   महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा||
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माँ कालरात्रि

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।कहा जाता है कि कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं।
मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है।
इस देवी के तीन नेत्र हैं। यह तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो।
बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए यह शुभंकरी कहलाईं। अर्थात इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं। उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।
कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।
मंत्र:
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

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माँ कात्यायनी

माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। उस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है।
इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
कथा: कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की। कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं।[4] इनका गुण शोधकार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं। यह वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं।
मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी।
इसीलिए यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। यह स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दायीं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मां के बाँयी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है।इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।
मंत्र:  चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
  कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
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