(१). रविवार व्रत विधि - रविव्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार प्रारंभ करें तथा १ वर्ष पर्यन्त अथवा ३० या १२ व्रत करना चाहिये। इस दिन भोजन में गेहूँ की रोटी अथवा गेहूँ का दलिया अथवा इनसे बना सीरा हलवा-गुड घी इलायची सहित बना सेवन करें। भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करें। भोजन सूर्यास्त से पहले करें तथा भोजन के पूर्व इस हलवा का कुछ भाग देवस्थान अथवा बालक बालिका को देकर भोजन करें। प्रथम हलवा सेवन करें फिर अन्य पदार्थ सेवन करें प्रात: स्नान करके रक्त चन्दन का तिलक करें तथा रोली, अक्षत, लाल पुष्प मिश्रित जल से सूर्यनारायण को जलांजलि श्रद्धापूर्वक प्रदान करें। अन्तिम रविवार को हवन क्रिया के बाद योग्य दम्पत्ति को भोजन कराकर लाल वस्त्र एवं यथेच्छा दक्षिणा प्रदान करें। व्रत के दिन लाल रंग का बनियान या वस्त्र धारण करना योग्य तथा ॐ हां ह्रीं ह्रौं स: इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जप करना भी योग्य है। हवन समिधा अर्क-आंकड़ा यह व्रत आयु-सौभाग्य-समस्त कामना सिद्धि-चर्मनेत्र आदि विकार नाशक हैं।
(२). सोमवार व्रत विधि - यह व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण या कार्तिक मार्गशीर्ष के मास से धारण करना योग्य है। तथापि किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से प्रारंभ करें तथा १० या ५४ व्रत करें। भोजन में दही, दूध-चावल अथवा खीर के प्रथम ७ ग्रास खावें फिर अन्य पदार्थ सेवन करें भोजन के पूर्व किसी विद्यार्थी को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का यथेच्छा अनुदान करें तथा भोजन सूर्यास्त बाद करना समुचित, इस दिन सफेद रंग के वस्त्रादि धारण करना चाहिए। प्रात: स्नान के बाद चन्दन का तिलक लगावें। तथा शिवालय के दर्शन दीप ज्योति सुगंध अर्पण आदि कार्य भी समुचित है । ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य है। अन्तिम सोमवार को हवन क्रिया के बाद बालक- विद्यार्थी को खीर सहित भोजन करावें। हवन समिधा पलाश तथा दक्षिणा स्वरूप चांदी अथवा सफेद वस्त्र देवें। यह व्रत व्यापार में लाभप्रदायक एवं मानसिक कष्ट विकारों के नाश हेतु फल प्रदायक है।
(३) मंगलवारव्रत विधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से प्रारंभ करें तथा २१ या ४५ व्रत करें। भोजन में गेहूँ के आटे गुड घी से बना हलवा एवं मोदक लड्डुओं का ५-७ ग्रास लेवें फिर यथेच्छा पदार्थ सेवन करें। परन्तु नमक का सेवन करना योग्य नहीं है। ये सेवनीय पदार्थ किसी बैल-पशु को खिलाकर भोजन करना भी योग्य है। इस दिन श्री हनुमानजी के मन्दिर में तैल का दीपक प्रदान करना भी योग्य तथा लाल पुष्प की माला अर्पण करना एवं श्रीफल अर्पण करना भी योग्य है तथा श्री हनुमान चालीसा- हनुमानाष्टक- बजरंग बाण के पाठ भी श्रद्धानिष्ठापूर्वक करना समुचित है एवमेव ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य । अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद बालक विद्यार्थी को लड्डुओं से भोजन करावें हवन समिधा खदिर-खैरकाष्ठ तथा दक्षिणा स्वरूप लाल वस्र, ताम्रपत्र, गुड, नारियल आदि का अनुदान योग्य । यह व्रत ऋण निवारक आर्थिक समस्या का समाधान सूचक एवं सन्तति सौख्य प्रदायक एवं आत्मशक्ति तत्व का विकास सूचक है
(४) बुधवारव्रतविधि-यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार से प्रारंभ तथा २१ या ४५ व्रत करें। भोजन में हरे मूंग की दाल चावल की खिचड़ी, मूँग का हलवा, हरे मूंग की पकौड़ी ४-५ ग्रास लेवें, अन्य पदार्थ बाद में सेवन करें। भोजन करने के पूर्व ५ - ७ तुलसी पत्र गंगाजल या शुद्धजल के साथ सेवन करें। इन्हीं सेवनीय वस्तु का किसी अपंग अंगहीन को भोजन के पूर्व अनुदान करना भी योग्य है। इस दिन हरे रंग का बनियान या वस्त्र धारण करें तथा ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य है। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद अंगहीन अथवा भिक्षुक को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का ही भोजन करावें, हवन समिधा अपामार्ग आंधीझाड़ा तथा दक्षिणास्वरूप कांसे का पात्र, २ फल, हरा रुमाल वस्त्र, मूंग आदि का अनुदान करें। यह व्रत विद्या-बुद्धिवर्द्धक तथा व्यापार वृद्धि का सूचक है। इस दिन श्री गणेशजी के देवस्थान पर दर्शन तथा १ पावमोदक का प्रसाद अर्पण करना एवं गाय को हरी घास खिलाना भी योग्य है।
(५) गुरूवारव्रतविधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार से प्रारंभ करें तथा ३ वर्ष या १ वर्ष अथवा १६ संख्या के व्रत करने का विधान है। इस दिन कुछ हल्दी मिश्रित जल से स्नान करें तथा केसर या हल्दी का तिलक लगावें। तथा पीले रंग का बनियान या वस्त्र धारण करें। भोजन में चने की दाल से बने पदार्थ हलवा मोदक केशरिया चावल आदि पदार्थ प्रथम ७ ग्रास लेवें, अन्य पदार्थ बाद में लेवें। इन्हीं वस्तु का किसी पीली गाय को अथवा विद्यार्थी एवं अध्यापक को अनुदान करना भी योग्य है। इस दिन केले के वृक्ष की पूजा दर्शन, जल प्रदान करना भी समुचित तथा जल में कुछ हल्दी सरसों मिलाकर जल प्रदान करें तथा ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरूवे नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद बालक-विद्यार्थियों को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का भोजन करावें । हवन समिधा अश्वत्थ-पीपल काष्ठ तथा दक्षिणास्वरूप स्वर्ण, पीतल पात्र, पीले वस्त्र-रूमाल, पीला चन्दन गट्टा, चने की दाल, हल्दी आदि का यथाशक्ति अनुदान करें। यह व्रत विद्या बुद्धि प्रदाता तथा उत्तम स्थान पद प्रदायक, धन सम्पदा की स्थिरता हेतु एवं दाम्पत्य सौख्य, सन्तति सुख, यशवृद्धि सूचक है
(६) शुक्रवार व्रत विधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार प्रारंभ करें तथा २१ या ३१ व्रत करने का विधान है इस दिन स्नान के बाद शुद्ध सफेद वस्त्र से ही पहनें यथासंभव सफेद वर्ण की गाय के दर्शन तथा सर्वप्रथम १ या २ कन्या के दर्शन करें तथा श्रीफल नारियल देवें। भोजन में दूध, दही, चावल, खीर, घी, साबूदाना, सफेद मावा मिष्ठान, केला, ज्वार, गेहूँ की रोटी आदि सफेद वस्तुमात्र सेवन करना ही योग्य है तथा अन्य पदार्थ सेवन करना समुचित नहीं। तथा ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप करें रात्रिशयन सफेद चादर पर ही करें तथा भक्तिसंगीत श्रवण पठन मनन करते शयन करें। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद ६ कन्याओं को उपरोक्त वस्तुओं का भोजन करावें तथा दक्षिणास्वरूप सफेद वस्त्र रूमाल, श्रृंगारिक वस्तु, चाँदी का यथाशक्ति अनुदान एवं किसी एकाक्षि (एक आँख वाले) व्यक्ति को भी ये अनुदान योग्य है। हवन समिधा गूलर-उदम्बर मान्य । यह व्रत अविवाहित स्त्री-पुरूष हेतु मनोकामना सिद्धि प्रदायक तथा दाम्पत्य सुख विवर्धक है एवं मांगलिक कार्य समाधान बनें। स्त्री-पुरुष एवं कुमार-कुमारी सभी वर्ग हेतु यह व्रत फलदायक है।
(७) शनिवार व्रत विधि - किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से प्रारंभ करें तथा १९, ३१ या ५१ व्रत करने का विधान है। इस दिन स्नान के बाद तेल का अनुदान करना योग्य है तथा १ लोटा जल में कुछ काले तिल, लोंग, दूध, शक्कर आदि मिलाकर पीपल अथवा शमी-खेजड़ा के वृक्ष के दर्शन करते पश्चिम दिशा की तरफ मुख रखते जल प्रदान करें। भोजन में उड़द दाल से बने पदार्थ तथा विविध फल विशेषकर केला एवं तेल से निर्मित पदार्थ का सेवन प्रथम ५-७ ग्रास तक लेवें अन्य पदार्थ बाद में लेवें। इन्हीं वस्तु का अनुदान इस दिन किसी काले कुत्ते-भिक्षुक या निर्धन को देवें। काले रंग का बनियान धारण करें तथा ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः इस बीज मंत्र का मानसिक जाप यथेच्छा करें। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद यथाशक्ति तेल, तिल, छतरी, जूता, कम्बल, नीला काला वस्त्र, लोहा-कुर्सी, तिल के मोदक का अनुदान निर्धन व्यक्ति को करें विशेषकर कबूतरों को दाना तथा चीटियों के बिल पर आटा डालना भी समुचित। हवन समिधा शमी-खेजड़ा। काले घोड़े की नाल अथवा नौका के कील से साधित मुद्रिका धारण करना भी समुचित है। यह व्रत विविध सांसारिक विकार-विवाधा-अनिष्ट एवं शत्रु विनाशक है। यह व्रतादिक नियामक स्वानुभवगत तथा विविध शास्त्र नियामक से अंकित किया गया है। ग्रन्थान्तर भेद से स्वल्पान्तर नियामक हेतु अन्यथा विचार नहीं लेवें तथापि सभी नियामक में यथा देशकाल स्थिति अनुसार व्यवहार कर्तव्यता समुचित है। परन्तु भोजन में भक्ष्य पदार्थ वस्त्र धारण अनुदान आदि का नियामक पूर्णतया परिपालन योग्य समझें।
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