मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

सात वारों के व्रत-विधि विधान

(१). रविवार व्रत विधि - रविव्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार प्रारंभ करें तथा १ वर्ष पर्यन्त अथवा ३० या १२ व्रत करना चाहिये। इस दिन भोजन में गेहूँ की रोटी अथवा गेहूँ का दलिया अथवा इनसे बना सीरा हलवा-गुड घी इलायची सहित बना सेवन करें। भोजन में नमक का प्रयोग नहीं करें। भोजन सूर्यास्त से पहले करें तथा भोजन के पूर्व इस हलवा का कुछ भाग देवस्थान अथवा बालक बालिका को देकर भोजन करें। प्रथम हलवा सेवन करें फिर अन्य पदार्थ सेवन करें प्रात: स्नान करके रक्त चन्दन का तिलक करें तथा रोली, अक्षत, लाल पुष्प मिश्रित जल से सूर्यनारायण को जलांजलि श्रद्धापूर्वक प्रदान करें। अन्तिम रविवार को हवन क्रिया के बाद योग्य दम्पत्ति को भोजन कराकर लाल वस्त्र एवं यथेच्छा दक्षिणा प्रदान करें। व्रत के दिन लाल रंग का बनियान या वस्त्र धारण करना योग्य तथा ॐ हां ह्रीं ह्रौं स: इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जप करना भी योग्य है। हवन समिधा अर्क-आंकड़ा यह व्रत आयु-सौभाग्य-समस्त कामना सिद्धि-चर्मनेत्र आदि विकार नाशक हैं।


(२). सोमवार व्रत विधि - यह व्रत चैत्र, वैशाख, श्रावण या कार्तिक मार्गशीर्ष के मास से धारण करना योग्य है। तथापि किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से प्रारंभ करें तथा १० या ५४ व्रत करें। भोजन में दही, दूध-चावल अथवा खीर के प्रथम ७ ग्रास खावें फिर अन्य पदार्थ सेवन करें भोजन के पूर्व किसी विद्यार्थी को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का यथेच्छा अनुदान करें तथा भोजन सूर्यास्त बाद करना समुचित, इस दिन सफेद रंग के वस्त्रादि धारण करना चाहिए। प्रात: स्नान के बाद चन्दन का तिलक लगावें। तथा शिवालय के दर्शन दीप ज्योति सुगंध अर्पण आदि कार्य भी समुचित है । ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य है। अन्तिम सोमवार को हवन क्रिया के बाद बालक- विद्यार्थी को खीर सहित भोजन करावें। हवन समिधा पलाश तथा दक्षिणा स्वरूप चांदी अथवा सफेद वस्त्र देवें। यह व्रत व्यापार में लाभप्रदायक एवं मानसिक कष्ट विकारों के नाश हेतु फल प्रदायक है।

(३) मंगलवारव्रत विधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से प्रारंभ करें तथा २१ या ४५ व्रत करें। भोजन में गेहूँ के आटे गुड घी से बना हलवा एवं मोदक लड्डुओं का ५-७ ग्रास लेवें फिर यथेच्छा पदार्थ सेवन करें। परन्तु नमक का सेवन करना योग्य नहीं है। ये सेवनीय पदार्थ किसी बैल-पशु को खिलाकर भोजन करना भी योग्य है। इस दिन श्री हनुमानजी के मन्दिर में तैल का दीपक प्रदान करना भी योग्य तथा लाल पुष्प की माला अर्पण करना एवं श्रीफल अर्पण करना भी योग्य है तथा श्री हनुमान चालीसा- हनुमानाष्टक- बजरंग बाण के पाठ भी श्रद्धानिष्ठापूर्वक करना समुचित है एवमेव ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य । अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद बालक विद्यार्थी को लड्डुओं से भोजन करावें हवन समिधा खदिर-खैरकाष्ठ तथा दक्षिणा स्वरूप लाल वस्र, ताम्रपत्र, गुड, नारियल आदि का अनुदान योग्य । यह व्रत ऋण निवारक आर्थिक समस्या का समाधान सूचक एवं सन्तति सौख्य प्रदायक एवं आत्मशक्ति तत्व का विकास सूचक है

(४) बुधवारव्रतविधि-यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार से प्रारंभ तथा २१ या ४५ व्रत करें। भोजन में हरे मूंग की दाल चावल की खिचड़ी, मूँग का हलवा, हरे मूंग की पकौड़ी ४-५ ग्रास लेवें, अन्य पदार्थ बाद में सेवन करें। भोजन करने के पूर्व ५ - ७ तुलसी पत्र गंगाजल या शुद्धजल के साथ सेवन करें। इन्हीं सेवनीय वस्तु का किसी अपंग अंगहीन को भोजन के पूर्व अनुदान करना भी योग्य है। इस दिन हरे रंग का बनियान या वस्त्र धारण करें तथा ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य है। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद अंगहीन अथवा भिक्षुक को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का ही भोजन करावें, हवन समिधा अपामार्ग आंधीझाड़ा तथा दक्षिणास्वरूप कांसे का पात्र, २ फल, हरा रुमाल वस्त्र, मूंग आदि का अनुदान करें। यह व्रत विद्या-बुद्धिवर्द्धक तथा व्यापार वृद्धि का सूचक है। इस दिन श्री गणेशजी के देवस्थान पर दर्शन तथा १ पावमोदक का प्रसाद अर्पण करना एवं गाय को हरी घास खिलाना भी योग्य है।

(५) गुरूवारव्रतविधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार से प्रारंभ करें तथा ३ वर्ष या १ वर्ष अथवा १६ संख्या के व्रत करने का विधान है। इस दिन कुछ‌ हल्दी मिश्रित जल से स्नान करें तथा केसर या हल्दी का तिलक लगावें। तथा पीले रंग का बनियान या वस्त्र धारण करें। भोजन में चने की दाल से बने पदार्थ हलवा मोदक केशरिया चावल आदि पदार्थ प्रथम ७ ग्रास लेवें, अन्य पदार्थ बाद में लेवें। इन्हीं वस्तु का किसी पीली गाय को अथवा विद्यार्थी एवं अध्यापक को अनुदान करना भी योग्य है। इस दिन केले के वृक्ष की पूजा दर्शन, जल प्रदान करना भी समुचित तथा जल में कुछ हल्दी सरसों मिलाकर जल प्रदान करें तथा ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरूवे नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप योग्य। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद बालक-विद्यार्थियों को उपरोक्त वस्तु पदार्थ का भोजन करावें । हवन समिधा अश्वत्थ-पीपल काष्ठ तथा दक्षिणास्वरूप स्वर्ण, पीतल पात्र, पीले वस्त्र-रूमाल, पीला चन्दन गट्टा, चने की दाल, हल्दी आदि का यथाशक्ति अनुदान करें। यह व्रत विद्या बुद्धि प्रदाता तथा उत्तम स्थान पद प्रदायक, धन सम्पदा की स्थिरता हेतु एवं दाम्पत्य सौख्य, सन्तति सुख, यशवृद्धि सूचक है

(६) शुक्रवार व्रत विधि - यह व्रत किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार प्रारंभ करें तथा २१ या ३१ व्रत करने का विधान है इस दिन स्नान के बाद शुद्ध सफेद वस्त्र से ही पहनें यथासंभव सफेद वर्ण की गाय के दर्शन तथा सर्वप्रथम १ या २ कन्या के दर्शन करें तथा श्रीफल नारियल देवें। भोजन में दूध, दही, चावल, खीर, घी, साबूदाना, सफेद मावा मिष्ठान, केला, ज्वार, गेहूँ की रोटी आदि सफेद वस्तुमात्र सेवन करना ही योग्य है तथा अन्य पदार्थ सेवन करना समुचित नहीं। तथा ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः इस बीज मंत्र का यथाशक्ति मानसिक जाप करें रात्रिशयन सफेद चादर पर ही करें तथा भक्तिसंगीत श्रवण पठन मनन करते शयन करें। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद ६ कन्याओं को उपरोक्त वस्तुओं का भोजन करावें तथा दक्षिणास्वरूप सफेद वस्त्र रूमाल, श्रृंगारिक वस्तु, चाँदी का यथाशक्ति अनुदान एवं किसी एकाक्षि (एक आँख वाले) व्यक्ति को भी ये अनुदान योग्य है। हवन समिधा गूलर-उदम्बर मान्य । यह व्रत अविवाहित स्त्री-पुरूष हेतु मनोकामना सिद्धि प्रदायक तथा दाम्पत्य सुख विवर्धक है एवं मांगलिक कार्य समाधान बनें। स्त्री-पुरुष एवं कुमार-कुमारी सभी वर्ग हेतु यह व्रत फलदायक है।

(७) शनिवार व्रत विधि - किसी शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से प्रारंभ करें तथा १९, ३१ या ५१ व्रत करने का विधान है। इस दिन स्नान के बाद तेल का अनुदान करना योग्य है तथा १ लोटा जल में कुछ काले तिल, लोंग, दूध, शक्कर आदि मिलाकर पीपल अथवा शमी-खेजड़ा के वृक्ष के दर्शन करते पश्चिम दिशा की तरफ मुख रखते जल प्रदान करें। भोजन में उड़द दाल से बने पदार्थ तथा विविध फल विशेषकर केला एवं तेल से निर्मित पदार्थ का सेवन प्रथम ५-७ ग्रास तक लेवें अन्य पदार्थ बाद में लेवें। इन्हीं वस्तु का अनुदान इस दिन किसी काले कुत्ते-भिक्षुक या निर्धन को देवें। काले रंग का बनियान धारण करें तथा ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनये नमः इस बीज मंत्र का मानसिक जाप यथेच्छा करें। अन्तिम व्रत दिवस पर हवन क्रिया के बाद यथाशक्ति तेल, तिल, छतरी, जूता, कम्बल, नीला काला वस्त्र, लोहा-कुर्सी, तिल के मोदक का अनुदान निर्धन व्यक्ति को करें विशेषकर कबूतरों को दाना तथा चीटियों के बिल पर आटा डालना भी समुचित। हवन समिधा शमी-खेजड़ा। काले घोड़े की नाल अथवा नौका के कील से साधित मुद्रिका धारण करना भी समुचित है। यह व्रत विविध सांसारिक विकार-विवाधा-अनिष्ट एवं शत्रु विनाशक है। यह व्रतादिक नियामक स्वानुभवगत तथा विविध शास्त्र नियामक से अंकित किया गया है। ग्रन्थान्तर भेद से स्वल्पान्तर नियामक हेतु अन्यथा विचार नहीं लेवें तथापि सभी नियामक में यथा देशकाल स्थिति अनुसार व्यवहार कर्तव्यता समुचित है। परन्तु भोजन में भक्ष्य पदार्थ वस्त्र धारण अनुदान आदि का नियामक पूर्णतया परिपालन योग्य समझें।

रविवार, 29 मार्च 2020

माँ सिद्धिदात्री

माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं।नवरात्र के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।मान्यता है कि इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है।इनका वाहन सिंह है और यह कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं।नवरात्र में यह अंतिम देवी हैं। हिमाचल के नंदापर्वत पर इनका प्रसिद्ध तीर्थ है।माना जाता है कि इनकी पूजा करने से बाकी देवीयों कि उपासना भी स्वंय हो जाती है।
यह देवी सर्व सिद्धियां प्रदान करने वाली देवी हैं।इनकी कृपा से कठिन से कठिन कार्य भी आसानी से संभव हो जाते हैं। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियां होती हैं। इसलिए इस देवी की सच्चे मन से विधि विधान से उपासना-आराधना करने से यह सभी सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं।
कहते हैं भगवान शिव ने भी इस देवी की कृपा से यह तमाम सिद्धियां प्राप्त की थीं। इस देवी की कृपा से ही शिव जी का आधा शरीर देवी का हुआ था।इसी कारण शिव अर्द्धनारीश्वर  नाम से प्रसिद्ध हुए।
इस देवी के दाहिनी तरफ नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा तथा बायीं तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल का पुष्प है।
विधि-विधान से नौंवे दिन इस देवी की उपासना करने से सिद्धियां प्राप्त होती हैं। इनकी साधना करने से लौकिक और परलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है| मां के चरणों में शरणागत होकर हमें निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उपासना करनी चाहिए। इस देवी का स्मरण, ध्यान, पूजन हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हैं और अमृत पद की ओर ले जाते हैं।
मंत्र:   सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
   सेव्यमाना सदा भूयाात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

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माँ महागौरी

माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी' यानी इनकी आयु आठ साल की मानी गई है। इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं। इसीलिए उन्हें श्वेताम्बरधरा कहा गया है। इनकि चार भुजाएं हैं और वाहन वृषभ है इसीलिए इनको वृषारूढ़ा भी कहा गया है|
इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है तथा नीचे वाला हाथ त्रिशूल धारण किया हुआ है। ऊपर वाले बांए हाथ में डमरू धारण कर रखा है और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है।पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी। इसी कारण से इनका शरीर काला पड़ गया लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिमय बना दिया। उनका रूप गौर वर्ण का हो गया। इसीलिए यह महागौरी कहलाईं|यह अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कल्मष धुल जाते हैं। पूर्वसंचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। महागौरी का पूजन-अर्चन, उपासना-आराधना कल्याणकारी है। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियां भी प्राप्त होती हैं।
एक और मान्यता के अनुसार एक भूखा सिंह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी ऊमा तपस्या कर रही होती है। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गई, लेकिन वह देवी के तपस्या से उठने का प्रतीक्षा करते हुए वहीं बैठ गया। इस प्रतीक्षा में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आ गई। उन्होने द्याभाव और प्रसन्न्ता से उसे भी अपना वाहन बना लिया क्‍योंकि वह उनकी तपस्या पूरी होने के प्रतीक्षा में स्वंय भी तप कर बैठा।
कहते है जो स्त्री मां की पूजा भक्ति भाव सहित करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वंय करती हैं। इन्हें अन्नपूर्णा, ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी भी कहा जाता है।
मंत्र:    श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
   महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा||
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माँ कालरात्रि

माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है।कहा जाता है कि कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं।
मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। नाम से ही जाहिर है कि इनका रूप भयानक है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। काल से भी रक्षा करने वाली यह शक्ति है।
इस देवी के तीन नेत्र हैं। यह तीनों ही नेत्र ब्रह्मांड के समान गोल हैं। इनकी सांसों से अग्नि निकलती रहती है। यह गर्दभ की सवारी करती हैं। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वर मुद्रा भक्तों को वर देती है। दाहिनी ही तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। यानी भक्तों हमेशा निडर, निर्भय रहो।
बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग है। इनका रूप भले ही भयंकर हो लेकिन यह सदैव शुभ फल देने वाली मां हैं। इसीलिए यह शुभंकरी कहलाईं। अर्थात इनसे भक्तों को किसी भी प्रकार से भयभीत या आतंकित होने की कतई आवश्यकता नहीं। उनके साक्षात्कार से भक्त पुण्य का भागी बनता है।
कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं। इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत-प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं। यह ग्रह बाधाओं को भी दूर करती हैं और अग्नि, जल, जंतु, शत्रु और रात्रि भय दूर हो जाते हैं। इनकी कृपा से भक्त हर तरह के भय से मुक्त हो जाता है।
मंत्र:
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥

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माँ कात्यायनी

माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है। उस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।नवरात्रि में छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है।
इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं।
कथा: कात्य गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन ने भगवती पराम्बा की उपासना की। कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि उन्हें पुत्री प्राप्त हो। मां भगवती ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसलिए यह देवी कात्यायनी कहलाईं।[4] इनका गुण शोधकार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं। यह वैद्यनाथ नामक स्थान पर प्रकट होकर पूजी गईं।
मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा की थी। यह पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की गई थी।
इसीलिए यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। यह स्वर्ण के समान चमकीली हैं और भास्वर हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। दायीं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में है तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में। मां के बाँयी तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार है व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित है। इनका वाहन भी सिंह है।इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं। जन्मों के समस्त पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि इस देवी की उपासना करने से परम पद की प्राप्ति होती है।
मंत्र:  चंद्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।
  कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
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मॉं स्कन्दमाता

नवरात्रि का पाँचवाँ दिन स्कन्दमाता  की उपासना का दिन होता है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली माता परम सुखदायी हैं। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती हैं। यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है|

पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं स्कंदमाता। नवरात्रि में पाँचवें दिन इस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से अभिहित किया गया है। इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं। इस देवी की चार भुजाएं हैं।
यह दायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बायीं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है। यह कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है।
शास्त्रों में इसका पुष्कल महत्व बताया गया है। इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। भक्त को मोक्ष मिलता है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कांतिमय हो जाता है। अतः मन को एकाग्र रखकर और पवित्र रखकर इस देवी की आराधना करने वाले साधक या भक्त को भवसागर पार करने में कठिनाई नहीं आती है।
उनकी पूजा से मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है। यह देवी विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली शक्ति है। यानी चेतना का निर्माण करने वालीं। कहते हैं कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत रचनाएं स्कंदमाता की कृपा से ही संभव हुईं।
मंत्र:  सिंहसनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
  शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी॥
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मॉं कूष्माण्डा

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्मांडादेवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन 'अदाहत' चक्र में अवस्थित होता है।
नवरात्रि में चौथे दिन देवी को कूष्मांडा के रूप में पूजा जाता है। अपनी मंद, हल्की हंसी के द्वारा अण्ड यानी ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इस देवी को कूष्मांडा नाम से अभिहित किया गया है। जब सृष्टि नहीं थी, चारों तरफ अंधकार ही अंधकार था, तब इसी देवी ने अपने ईषत्‌ हास्य से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसीलिए इसे सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति कहा गया है।
इस देवी की आठ भुजाएं हैं, इसलिए अष्टभुजा कहलाईं। इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जप माला है। इस देवी का वाहन सिंह है और इन्हें कुम्हड़े की बलि प्रिय है। संस्कृत में कुम्हड़े को कूष्मांड कहते हैं इसलिए इस देवी को कूष्मांडा।
इस देवी का वास सूर्यमंडल के भीतर लोक में है। सूर्यलोक में रहने की शक्ति क्षमता केवल इन्हीं में है। इसीलिए इनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य की भांति ही दैदीप्यमान है। इनके ही तेज से दसों दिशाएं आलोकित हैं। ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में इन्हीं का तेज व्याप्त है।
अचंचल और पवित्र मन से नवरात्रि के चौथे दिन इस देवी की पूजा-आराधना करना चाहिए। इससे भक्तों के रोगों और शोकों का नाश होता है तथा उसे आयु, यश, बल और आरोग्य प्राप्त होता है। यह देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती हैं। सच्चे मन से पूजा करने वाले को सुगमता से परम पद प्राप्त होता है।विधि-विधान से पूजा करने पर भक्त को कम समय में ही कृपा का सूक्ष्म भाव अनुभव होने लगता है। यह देवी आधियों-व्याधियों से मुक्त करती हैं और उसे सुख समृद्धि और उन्नति प्रदान करती हैं। अंततः इस देवी की उपासना में भक्तों को सदैव तत्पर रहना चाहिए।
मंत्र:   सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।
   दधाना हस्तपद्माभ्यां कुष्मांडा शुभदास्तु मे॥
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माँ चंद्रघंटा


मां दुर्गा तीसरा स्वरूप चंद्रघंटा है नवरात्रि के तीसरे दिन साधक मां चंद्रघंटा का पूजन करते हैं इस दिन साधक का मन मणिपूर चक्र में प्रविष्ट होता है|



देवी की कृपा से साधक को अलौकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है दिव्य सुगंधि व मधुर ध्वनिउत्पन्न होती है।
कथा देवी का यह स्वरूप परम शांति दायक और कल्याणकारी माना गया है इसलिए कहा जाता है हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखकर साधना करनी चाहिए देवी के मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है इसलिए देवी का नाम चंद्रघंटा पड़ा इनके शरीर का रंग सोने के समान बहुत अधिक चमकीला है इस इन देवी के 10 हाथ हैं वह खड़क और अन्य अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं सिंह पर सवार देवी की मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की है इनके घंटे सी भयानक ध्वनि से अत्याचारी दानव दैत्य राक्षस कांपते रहते हैं देवी की आराधना से साधक में वीरता और निर्भयता के साथ ही सौम्यता और विनम्रता का विकास होता है इसलिए हमें चाहिए कि मन वचन और कर्म के साथ ही काया को विहित विधि-विधान के अनुसार परिषद पवित्र करके चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना आराधना करनी चाहिए इससे सारे कष्टों से मुक्त होकर सहज ही परम पद के अधिकारी बन सकते हैं|
 मंत्र: पिंडजप्रवारूढ़ा चंडकोपास्त्र केयुता ।
        प्रसादमतनुतेमह्मं चन्द्रघंटेति विश्रुता।।
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माँ ब्रम्ह्चारिणी

नवरात्री के द्वितीय दिवस पर साधक माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना करते है| ब्रम्ह का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली|ब्रम्ह्चारिणी का अर्थ है है तपस्या करने वाली |
भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए इन्होने कठिन तपस्या की थी इस कारण भी इन्हें ब्रम्ह्चारिणी कहा जाता है|



कथा:-कथा पूर्व जन्म में इन्होंने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारद जी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। 1000 वर्ष तक उन्होंने केवल फल फूल खाकर बिताए और 100 वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखें और खुले आकाश के नीचे धूप के घोर कष्ट सहे।3000 वर्षों तक सूखे हुए बिल्वपत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती नहीं इसके बाद उन्होंने सूखे बिल्वपत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निराहार रहकर तपस्या करती रही। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा पड़ गया।
 

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता ऋषि गण सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया और कहा," हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की घटोर तपस्या नहीं कि यह तभी संभव थी तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्र मौली शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ।"
मंत्र: दधाना करपदमाभ्यांक्षमालाकमण्डलू।
       देवी प्रसीदतु मयि ब्रम्ह चारिण्य नुत्तमा।।
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शनिवार, 28 मार्च 2020

माँ शैलपुत्री

वदुर्गा के पहले स्वरुप में पूजी जाने वाली माँ शैलपुत्री नवदुर्गाओं में पहली दुर्गा हैं| इन्हें हम सभी पार्वती के नाम से जानते हैं|इनका वाहन वृषभ है| नवरात्री के प्रथम दिवस पर साधक माँ शैलपुत्री कि आराधना करते है| 

कथा:-एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।
सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।
वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।
सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।
मंत्र:-  वन्दे वांक्षित लाभाय चंद्रार्धकृत शेखरां |
         वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीम्यशस्विनीम् ||   
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सोमवार, 23 मार्च 2020

https://youtu.be/A9b4AfwkK5Q
प्रिय दर्शकों, हिन्दू नववर्ष गुड़ी पड़वा कि बहुत बहुत शुभकामनाएं! इस वीडियो में मैंने आप सभी को शुभकामना सन्देश के साथ ही नव संवत्सर का महत्व आदि को समझाने का प्रयास किया है! आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा वर्ष के प्रथम दिन से मैं अपने चैनल समाधान ज्योतिष परामर्श का शुभारंभ कर रहा हूँ! आपके इस चैनल पर आपको ज्योतिष एवं हिन्दू सनातन पद्धति से सम्बंधित एक वीडियो प्रतिदिन मिलेगी| आप इसे अवश्य देखें like करें share करे और कमेंट करके मुझे आपके विचार बताएं जिससे आपके अपने चैनल पर अपेक्षित परिवर्तन किये जा सके| यदि आपको हमारा चैनल पसंद आये तो चैनल को subscribe अवश्य करें जिससे आपको हमारा वीडियो सबसे पहले मिल सकें| एक बार फिर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा हिन्दू नववर्ष कि बहुत बहुत शुभकामनाएँ| बहुत बहुत धन्यवाद!! -----------------------------LIKE !!-----SHARE!!-------SUBSCRIBE!!--------------------------------- Connect US BY:- www.facbook.com/GirishDayalChaturvedi https://twitter.com/AstroGirishji http://samadhanjyotishparamarsh.blogspot.com/ नमो राघवाय!! ||----------------||----------------||______________________________||---------------||---------------||
  

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

ॐ गायत्री मंत्र के अद्भुत प्रयोग


ॐ गायत्री मंत्र के अद्भुत प्रयोग
भगवद्गीता प्रमाणिक धार्मिक ग्रन्थ है | उसके अंतर्गत भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि “प्रज्ञानां जप यज्ञानां”  मैं समस्त प्रकार के यज्ञों में जप यज्ञ हूँ क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ है | जप यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है | यह बात समस्त गायत्री मन्त्रों के सन्दर्भ में ही कही गयी है क्योंकि गायत्री को “मन्त्रों का राजा” कहा गया है | गायत्री ही सबसे बड़ी शक्ति है | उसका सीधा सम्बन्ध इस प्रकार है –
श्लोक – “बुद्धिर्यस्य बलंतस्य निर्बुद्धस्तु कुतोबलम |
        वने सिंह मदोन्यन्तः शशरेणनिपातितः||”
अर्थ – बुद्धि ही सबसे बड़ा फल है और गायत्री में सूर्य भगवान से बुद्धि को सन्मार्ग पर चलाने कि प्रेरणा के लिए निवेदन किया गया है | गायत्री के विषय में कुछ ज्ञातव्य इस प्रकार है –
श्लोक – शाप युक्तासु गायत्री सफला न कदाचन |
       शापादुतिराता सातु मुक्ति भुक्ति फलप्रदः ||
अर्थ – शाप युक्त गायत्री सफल नहीं होती तथा शाप मुक्त गायत्री काम्य वस्तुओं के अतिरिक्त मुक्ति प्रदान कार सकती है | गायत्री जाप से पूर्व शाप विमोचन इस प्रकार करना चाहिए –
ॐ वेदान्तनाथाय विद्महे हिरण्यगर्भाय धीमहि तन्नो बुध्मः प्रचोदयातदेवी गायत्री त्वं बुध्य शाप विमुका भव |
यह मंत्र से पहले अनिवार्य है |
सूर्योदय के समय गायत्री जाप करने से आयु आरोग्य ऐश्वर्य और धन निश्चित ही प्राप्त होता है एक बात और विशेष है कि कलयुग में पृथ्वी पर सर्वत्र इंद्र का राज्य है किसी स्थान पर किये गए जप का प्रभाव इंद्र को ही प्राप्त होता है | जप स्थान पर आसन के नीचे कि मिट्टी से मस्तक पर तिलक करने से फल जपकर्ता को प्राप्त होता है | फिर हमें कृष्णार्पण करने से फल और लाभ निश्चय ही प्राप्त होता है |
“कलौ संख्यौ चतुर्गुणाः” मंत्र के अक्षरों का चार गुना जाप करने से लाभ होता है | यह कलयुग का प्रमाण है | गायत्री का तीन लाख जाप करना तो अनिवार्य है | हवन की कुछ विशिष्ट बातें इस प्रकार है –
1.       शमी, बिल्व अथवा आक की समिधा और घृत से हवन करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है |
2.       बिल्व पत्र को घृत में डुबोकर हवन करने से मनुष्य महान धनवान होता है |
3.       गूगलकी गोलियों से हवन करने से भाग्य वृद्धि होती है |
4.       काम्य वस्तुओं की प्राप्ति हेतु पलाश (ढाक) के पुष्पों द्वारा हवन करना लाभप्रद होता है |
5.       तिल, जवा और घृत से हवन करने से श्रेष्ठ पद कि प्राप्ति होती है |
6.       अमृता (गिलोय) के टुकड़ों का घृत या दुग्ध के साथ हवन करने से अकाल मृत्यु का निवारण होता है |
7.       जूही के पुष्पों से हवन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है |
8.       पीपल, गूलर या बरगद किसी की भी समिधा से हवन करने से ग्रह क्लेश शांत होतें है |
9.       विल्व पात्र (पुष्प, फल या जड़) किसी से भी हवन करने से लक्ष्मी कि प्राप्ति होती है |  

गुरुवार, 19 मार्च 2020

वार्षिक राशिफल २०२०

राशिफल शुभ संवत २०७७
सन् - 2020-21 

मेष राशि-इस वर्ष मेष राशि वालों को वर्ष के प्रारंभ में ही धन, मान-सम्मान की प्राप्ति होगी। मई-जून में लंबी यात्रा हो सकती है। छोटे भाई-बहनों के स्वास्थ्य में कमी रह सकती है। इस वर्ष व्यय की अधिकता रहेगी। मित्रों से विवाद से बचना चाहिए। दांपत्य जीवन सुखमय रहेगा। व्यापार-व्यवसाय में अच्छी सफलता मिलेगी। माता-पिता के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना होगा। वायु रोग और नेत्र पीड़ा रहेगी। धार्मिक कार्यों पर व्यय होगा। घर में शुभ मांगलिक कार्य होंगे। राज्य पक्ष से लाभ होगा। इस वर्ष विद्यार्थियों के लिए सामान्य सफलता के योग है। सरकारी नौकरी वालो को इस वर्ष पदोन्नति मिल सकती है। इस वर्ष कोई नया वाहन खरीदने का योग भी बन रहा हैं।

उपाय- भगवान शिव की आराधना करें। पार्थिव पूजन, मंगलवार का व्रत, लाल वस्तुओं का दान करने से लाभ होगा।

वृषभ राशि- इस वर्ष वृषभ राशि वालों को मान-सम्मान में वृद्धि मिलेगी। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी जैसे हाथ-पैर, कमर दर्द की शिकायत रह सकती है। धन-संपत्ति के मामलों में कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। आर्थिक क्षेत्र में हानि, कुटुंब में विरोध और वाद-विवाद की संभावना है। वाणी पर संयम बनाए रखें। विद्यार्थियों का मन पढ़ाई में कम लगेगा। वर्ष के उत्तरार्ध में विशेष अनुकूलता रहेगी। नौकरी व्यापार में अपेक्षित सफलताएं मिलेंगी। शासकीय कार्यों में लाभ मिलेगा। वाहन सावधानी से चलाएं। वर्ष के उत्तरार्ध में ऋण लाभ होगा। न्यायालय संबंधित क्षेत्रों में सफलताएं मिलेंगी।

उपाय- देवी की आराधना करें। शुक्रवार को सफेद वस्तुओं का दान करने से लाभ होगा।

मिथुन राशि - इस वर्ष मिथुन राशि वालों को ढैया शनि का प्रभाव लोहे के पाये से रहेगा। यह अनेक कष्ट प्रद होगा। मिथुन राशि वालों को इस वर्ष स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। मान-सम्मान में भी कुछ कमी अनुभव करेंगे। वर्ष के आरंभ में धन लाभ होगा। भाई बहन की उन्नति होगी। कुसंग से बचने के प्रयास करें। मति भ्रम तथा मानसिक तनाव की स्थिति बनी रहेगी। महत्वपूर्ण निर्णय लेने में असमंजस का अनुभव करेंगे।आर्थिक उतार-चढ़ाव का सामना भी करना पड़ सकता है। माता-पिता के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। धार्मिक यात्राएं हो सकती हैं। वर्ष के उत्तरार्ध में अच्छी स्थिति बन रही है।

उपाय- श्रीगणेश जी की उपासना करें। सुन्दरकाण्ड का पाठ करें तथा हरी वस्तुओं का दान करने से लाभ होगा।

कर्क राशि-इस वर्ष कर्क राशि वालों को धन-धान्य का लाभ होगा। स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहेगा। लंबी यात्रा हो सकती है। खर्चे की अधिकता रहेगी।आपको वाद-विवाद से बचना चाहिए। स्थान परिवर्तन हो सकता है। माता के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। न्यायालय संबंधी कार्यों में सफलता मिलेगी। वाहन सावधानी से चलाएं। जीवन साथी के कार्य क्षेत्र में उन्नति होगी। व्यापार-व्यवसाय में सफलता के योग हैं। जिन कर्क राशि वालों के विवाह रुके हुए थे, इस वर्ष उनके विवाह होंगे। आकस्मिक धन लाभ के योग हैं।

उपाय- सोमवार का व्रत करें। सफेद वस्तुओं का दान करने से भी लाभ होगा।

सिंह राशि-इस वर्ष सिंह राशि वालों को मान सम्मान मिलेगा। रोगों से मुक्ति मिलेगी। धार्मिक यात्राएं हो सकती हैं। न्यायालयीन प्रकरणों में सफलता मिलेगी। वर्ष के उत्तरार्द्ध भूमि-भवन निर्माण संबंधित कार्यों में व्यवधान रहेंगे । इस वर्ष जीवन साथी के स्वास्थ्य में कमी रह सकती है। व्यापार-व्यवसाय क्षेत्र में कुछ रुकावट के साथ सफलता मिलेगी। इस वर्ष संतान के स्वास्थ्य एवं शिक्षा की चिंता रहेगी। विद्यार्थियों को शिक्षा क्षेत्र में अच्छा लाभ होगा। नौकरी करने वालों को कार्य क्षेत्र में कुछ उतार-चढ़ाव रहेंगे। वर्ष के उत्तरार्ध में स्थान परिवर्तन की भी संभावना रहेगी।

उपाय-रविवार का व्रत करें तथा लाल वस्तुओं का दान करें। श्री आदित्यहृदयस्त्रोत का पाठ करें।

कन्या राशि- इस वर्ष कन्या राशि वालों को गृह-निर्माण तथा घरेलू सुख-सुविधाओं पर व्यय होगा। व्यापार-व्यवसाय के क्षेत्र में वर्ष के उत्तरार्ध में अच्छी सफलता मिलेगी। संतान की उन्नति होगी। विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिलेगी। स्वास्थ्य अच्छा रहेगा परन्तु कुछ पेट संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। घर में शुभ मांगलिक कार्य होने की संभावना है। विदेश यात्रा हो सकती है। इस वर्ष कुछ भावनात्मक पीड़ा रहेगी। वर्ष के उत्तरार्ध में स्थायी संपत्ति पर व्यय होगा। छोटे भाई बहनों के सुख स्वास्थ्य की चिंता रहेगी।

उपाय- भगवान विष्णु की पूजा करें। गुरुवार का व्रत करें तथा हरी वस्तुओं का दान करें।

तुला राशि- इस वर्ष तुला राशि वालों को ढैया शनि का प्रभाव लोहे के पाये से है । यह कष्टप्रद होगा। इस वर्ष तुला राशि वाले जातकों को सरकारी पक्ष से लाभ हो सकता है। भूमि-भवन, क्रय-विक्रय, गृह निर्माण संबंधी क्षेत्र में लाभ होगा। नवीन वाहन खरीद सकते हैं। मित्रों से वाद-विवाद हो सकता है। छोटे भाई बहन के सुख स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। क्रोध से बचना चाहिए। विद्यार्थियों के लिए यह वर्ष सफलताप्रद है। पिता के स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें, स्वयं को भी कमर तथा पैरों में दर्द की शिकायत रहेगी। अधिकारी वर्ग से वाद-विवाद रहने की संभावना है। यह वर्ष आपके जीवन में उतार-चढ़ाव पूर्ण रहेगा।

उपाय- रविवार का व्रत करें। हनुमान जी की उपासना करें और सुन्दरकाण्ड का पाठ करना लाभकारी होगा।

वृश्चिक राशि- इस वर्ष वृश्चिक राशि वालों को परिश्रम की अधिकता रहेगी‌। विद्यार्थियों को विशेष परिश्रम करने के बाद सफलता मिलेगी। इस वर्ष आपकी लंबी धार्मिक यात्राएं हो सकती हैं। स्थायी संपत्ति पर व्यय होने की संभावना है। घर में किसी वृद्ध व्यक्ति के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। वाणी पर संयम रखें। पारिवारिक सामंजस्य का अभाव रहेगा। वर्ष के उत्तरार्ध में ब्लड प्रेशर गर्मी से उत्पन्न रोग हो सकते हैं। नेत्र विकार की संभावना है। जीवनसाथी के नौकरी-व्यवसाय में उन्नति होगी। वर्ष के उत्तरार्ध में जीवन साथी के स्वास्थ्य में कुछ कमी रह सकती है। संतान संबंधी हर्ष होगा।

उपाय- मंगलवार का व्रत करें। रुद्राभिषेक तथा राहु की शांति कराएं।

धनु राशि- इस वर्ष धनु राशि वाले जातकों को उतरती हुई (पैरों पर) साढ़े साती चांदी के पाये से लाभ एवं सुखप्रद रहेगी। धनु राशि वाले जातकों को कुछ उतार-चढ़ाव बने रहेंगे। ब्लड प्रेशर नेत्र विकार रहने की संभावना रह सकती है। धन-संपत्ति की प्राप्ति होगी। घरेलू सुख सुविधाओं में वृद्धि होगी। ज़मीन-जायदाद के मामले में सफलता मिलेगी। विद्यार्थियों को अच्छी सफलता के योग हैं। पारिवारिक यश की वृद्धि होगी।जीवन साथी के स्वास्थ्य में कमी रह सकती है। व्यापार-व्यवसाय के क्षेत्र में वर्ष आरंभ में कुछ परेशानी रहेगी लेकिन उत्तरार्ध में अच्छी सफलताएं मिलेंगी। वाणी पर संयम बनाए रखें। परिवार में शुभ मांगलिक कार्य होंगे।

उपाय- सुंदरकांड का पाठ करें। गुरुवार का व्रत करें राहु का जाप एवं दान करने से लाभ होगा।

मकर राशि- इस वर्ष मकर राशि वाले जातकों को साढ़े साती का प्रभाव स्वर्ण के पाये से हृदय पर रहेगा। जो सर्वसुखप्रद होगा। इस वर्ष मकर राशि वाले जातकों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। देश-विदेश की यात्राएं होंगी। मान-सम्मान की प्राप्ति होगी। छोटे भाई बहनों की उन्नति होगी। मामा पक्ष में कुछ हानि हो सकती है। नौकरी- व्यवसाय के क्षेत्र में उत्तम लाभ होगा। सामाजिक यश तथा मान-सम्मान मिलेगा। राज्य पक्ष से लाभ होगा। कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलताएं मिलेंगी। वर्ष के उत्तरार्ध में संतान संबंधी कुछ चिंताएं रह सकती हैं। विद्यार्थियों के लिए यह वर्ष बहुत अच्छा रहेगा।

उपाय- शनिवार का व्रत करें। हनुमान जी की उपासना, सुंदरकांड का पाठ तथा शनि का दान करने से लाभ होगा।


कुंभ राशि- इस वर्ष कुंभ राशि वाले जातकों को साढ़े साती का प्रभाव लोहे के पाये से सिर पर रहेगा, जो अनेक संकट कारक होगा। इस वर्ष कुंभ राशि वाले जातकों को शारीरिक सुख स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए। वर्ष के आरंभ से ही यात्राओं की अधिकता रहेगी। आमदनी के अच्छे योग हैं। ऋण लेने से बचने के प्रयास करें। कुटुंब परिवार के सुख समृद्धि में वृद्धि होगी। इस वर्ष के प्रारंभ में संतान के स्वास्थ्य की चिंता होगी। उत्तरार्ध में स्थान परिवर्तन हो सकता है। व्यय की अधिकता रहेगी। जीवनसाथी के स्वास्थ्य का ध्यान रखें, वात रोगों का प्रभाव रहेगा। धार्मिक यात्राएं हो सकती है। विद्यार्थियों के लिए वर्ष आरंभ में कुछ परेशानी रह सकती है। वर्ष के उत्तरार्ध में अच्छी सफलता मिलेगी।

उपाय- शनिवार का व्रत करें तथा राहु की शांति कराएं। सुंदरकांड का पाठ करें तथा शनि संबंधित दान करें।

मीन राशि- इस वर्ष मीन राशि वाले जातकों को आर्थिक लाभ मिलेगा। व्यापार व्यवसाय में सफलता मिलेगी तथा यश की प्राप्ति होगी। इस वर्ष आपकी धार्मिक यात्राएं हो सकती हैं। संतान की विशेष उन्नति होगी। माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखना है। स्थान परिवर्तन के योग हैं। जमीन जायदाद के मामलों में कुछ परेशानियों के बाद सफलता के योग हैं। वाहन सावधानी से चलाएं। इस वर्ष मानसिक तनाव तथा भावनात्मक पीड़ा रहने की संभावना है। नौकरी के क्षेत्र में उन्नति के योग हैं। विद्यार्थियों को अच्छी सफलता मिलेगी। जीवनसाथी के स्वास्थ्य में वृद्धि होगी। घर में मांगलिक कार्य होंगे।

उपाय- गुरुवार का व्रत करें। पीली वस्तुओं का दान करें।श्रीलक्ष्मीनारायण भगवान की उपासना करें।


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*समाधान ज्योतिष परामर्श केंद्र*
पंडित गिरीश दयाल चतुर्वेदी
(ज्योतिष एवं कर्मकांड विशेषज्ञ)
"राघवाश्रय" LIG II A 192
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विदिशा (मध्य प्रदेश)
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