रविवार, 29 मार्च 2020

माँ ब्रम्ह्चारिणी

नवरात्री के द्वितीय दिवस पर साधक माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना करते है| ब्रम्ह का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली|ब्रम्ह्चारिणी का अर्थ है है तपस्या करने वाली |
भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए इन्होने कठिन तपस्या की थी इस कारण भी इन्हें ब्रम्ह्चारिणी कहा जाता है|



कथा:-कथा पूर्व जन्म में इन्होंने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारद जी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। 1000 वर्ष तक उन्होंने केवल फल फूल खाकर बिताए और 100 वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखें और खुले आकाश के नीचे धूप के घोर कष्ट सहे।3000 वर्षों तक सूखे हुए बिल्वपत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती नहीं इसके बाद उन्होंने सूखे बिल्वपत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निराहार रहकर तपस्या करती रही। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा पड़ गया।
 

कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता ऋषि गण सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया और कहा," हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की घटोर तपस्या नहीं कि यह तभी संभव थी तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्र मौली शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ।"
मंत्र: दधाना करपदमाभ्यांक्षमालाकमण्डलू।
       देवी प्रसीदतु मयि ब्रम्ह चारिण्य नुत्तमा।।
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