नवग्रह परिचय

सूर्य ग्रह -
                सूर्य  सौर परिवार का मुखिया है,जिसके चारो ओर अनेक ग्रह उसकी परिक्रमा करते है|सूर्य सदैव मार्गी एवं उदय रहने वाला ग्रह है|  प्रथ्वी के अपनी धुरी पर सदैव घूमते रहने के कारण सूर्य कहीं उदय तो कहीं अस्त होता है| उदयास्त तो भ्रम्पात्र है| वास्तव में सूर्य अस्त होता ही नहीं है, इसीलिए एक स्थान पर सूर्यास्त के कारण संध्या होती है तो दूसरे स्थान पर सवेरा दिखाई पड़ता है|


·      वर्ण –नारंगी लाल मतान्तर से ताम्र वर्ण

·      स्वरुप-सुन्दर

·      आकृति-गोल

·      तत्व-अग्नि

·      स्वभाव-स्थिर

·      प्रकृति-पित्त

·      गोत्र-सूर्य

·      वार-रविवार

·      राज्याधिकार-राजा

·      शरीर में प्रभाव-सिर से मुख तक

·      उपरत्न-गार्नेट,संग सितारा,रेड स्टार,नारंगी अकीक,गुलाबी ओनेक्स

·      संज्ञा-क्रूर

·      क्रीड़ास्थल-देवभूमि

·      रूचि-राजनीति शास्त्र

·      भाग्योदय काल-२२ से २४ वर्ष तक

·      जड़ी-बिल्व बेल मूल

·      दान का समय-सूर्योदय काल

·      मंडल-वर्तुल

·      भाग-मध्य

·      विचारणीय विषय-आत्मा,पिता,स्वाभाव,लक्ष्मी,सामर्थ्य एवं आरोग्यता

·      विद्या-वैद्यक

·      दीप्तांश-१५ अंश

·      दिशा-पूर्व

·      अवस्था-लगभग ५० वर्ष प्रौढ़

·      लिंग-पुरुष

·      गुण-सत्व

·      स्वाद-कड़वा

·      धातु-स्वर्ण मतान्तर से तांबा

·      जाति-क्षत्रिय

·      वाहन-सप्ताश्वरथ

·      समिधा-मदार

·      ऋतू-ग्रीष्म

·      कद-सामान्य

·      रत्न-माणिक्य

·      निसर्गबल-सभी ग्रहों से अधिक बली

·      पराभव-किसी से नहीं

·      बलि-दिन में

·      स्थान-पशुभूमि अर्थात् गौशाला

·      दोष शमन-सभी ग्रहों का

·      शुभाशुभ-अशुभ

·      दान पदार्थ-माणिक्य,गेहूँ, सवत्सा गौ, कषाय वस्त्र ,गुड ,सोना-तांबा ,रक्तचन्दन ,लाल पुष्प

·      देश-कलिंग

·      देवता-अग्निदेव

·      स्वामी-सिंह राशि का

·      रोग-पित्तविकार ,नेत्र रोग ,अस्थि ज्वर ,अस्थिदौर्बल्य ,हड्डी टूटना व कर्ण रोग

·      द्रष्टि-उर्ध्व

·      शरीर में कारक-अस्थि व पित्त

·      शुष्कता-शुष्क

·      राशिमोगावधि-एक मास

·      कालसमय-अयन 



 

चन्द्र ग्रह-
          सूर्य के बाद चन्द्रमा को ही महत्ता दी जाती है क्योंकि प्रथ्वी पर से सूर्य के बाद सबसे बड़ा दिखने वाला ग्रह चन्द्रमा है|पद्मपुराणानुसार ब्रम्हा के पुत्र महर्षि अत्रि ने अपने पिता ब्रम्हा की आज्ञानुसार स्रष्टि उत्पन्न करने के लिए “अनुत्तर” नामक तप किया था| तप पूर्ण होने पर अत्रि के नेत्रों से जल की बूंदे गिरी,उन अश्रु कणों से सारा जगत आलौकिक प्रकाश से जगमगा उठा ,उस समय दिशाओं ने स्त्री रूप में उपस्थित होकर उन अश्रुकणों को पुत्र प्राप्ति की कामाना से स्वयं ग्रहण कर लिया, लेकिन धारण न रख सकने के कारण त्याग दिया, दिशाओं द्वारा परित्यक्त गर्भ को ब्रम्हा जी ने एक युवा पुरुष के रूप में बदल दिया| तदोपरांत उस युवक को ब्रम्ह्लोक में अपने साथ ले गए और उसका नाम चन्द्रमा रख दिया| ब्रम्ह्लोक में देवताओं गन्धर्वों,ऋषिमुनियों व अप्सराओं द्वारा स्तुति किये जाने पर चन्द्रमा के तेज में वृद्धि हो गई| इस तेज के प्रसारित होने पर पृथ्वी पर अनेकानेक प्रकार की दिव्य औषधियों की उत्त्पत्ति हुई| प्रचेताओं के पुत्र प्रजापति दक्ष ने प्रभावित होकर अपनी सत्ताईस कन्याओं का विवाह चन्द्रमा के साथ कर दिया| इसके बाद चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ करके एश्वर्य और यश की उपलब्धि की| चन्द्रमा की सत्ताईस पत्नियां  ही सत्ताईस नक्षत्रों के नाम से जानी जाती है| अत्रि का पुत्र होने के कारण चन्द्रमा को “आत्रेय” भी कहा जाता है|

·   



·      वर्ण- शुभ्र

·      स्वरुप- सुन्दर

·      आकृति- स्थूल

·      तत्व- जल

·      स्वभाव- चर(चंचल)

·      प्रकृति- कफ

·      गोत्र- अत्रि

·      वाहन- हरिण 

·      राज्याधिकार- रानी

·      शरीर में प्रभाव- गले से ह्रदय तक

·      उपरत्न- चंद्रमणि

·      पराभव- बुध से पराजित

·      संज्ञा- शुभाशुभ के अनुसार पूर्णबली चन्द्र हो तो शुभ जबकि क्षीणबली चन्द्र हो तो अशुभ  

·      रूचि- ज्योतिष शास्त्र में

·      भाग्योदय काल- २४ से २५ वर्ष तक

·      जड़ी- खिरनी की जड़

·      दान पदार्थ- बांस के पात्र में चावल

·      अवस्था- युवा-तरुणी

·      लिंग- स्त्री

·      गुण- सत्व

·      स्वाद- नमकीन

·      धातु- चाँदी

·      जाति- वैश्य

·      वार- सोमवार

·      समिधा- पलाश

·      ऋतु- वर्षा  

·      कद- दीर्घ(लम्बा)

·      रत्न- मोती

·      निसर्गबल- शुक्र से अधिक बली

·      बली- रात्रि

·      क्रीड़ास्थल- जलाशय

·      स्थान- जलाशय व गीली भूमि

·      दोषशमन- राहु, बुध, शनि, मंगल, शुक्र और गुरु का

·      शुभाशुभ- पूर्ण बली हो तो शुभ जबकि क्षीणबली हो तो अशुभ 

·      दान का समय- संध्या समय

·      भाग- x

·      विचारणीय विषय- मन, बुद्धि, माता, धन, प्रसन्नता एवं उन्नति

·      विद्या- ज्योतिष

·      दीप्तांश-१२ अन्श

·      द्रष्टि- सम

·      शरीर में कारक- रक्त

·      काल समय- मुहूर्त

·      मंडल- चतुरस्त्र या त्रिकोणाकार

·      देश- यमुनातटवर्ती

·      देवता- वरुण

·      स्वामी- कर्क राशि का

·      रोग- रक्त विकार, रक्ताभाव, रक्तचाप, जलोधर, उन्माद, शीतज्वर एवं कफ विकार

·      दिशा- वायव्य

·      शुष्कता- जलीय

·      राशिभोगावधि- ढाई दिन




मंगल ग्रह –
           पृथ्वी का निकटवर्ती ग्रह मंगल लाल होने के कारण युद्ध का देवता (God of War) कहलाता है | मंगल ग्रह को युद्ध के देवता कार्तिकेय का ही स्वरुप माना जाता है | मंगल शिव और पृथ्वी का पुत्र होने से भौम, भूमिपुत्र, महासुत कहलाता है | इसका रंग लाल होने से वह ‘लोहित’ भी कहलाया और कालिदास इसीलिए संस्कृत साहित्य में अंगारक भी कहा है |



        कार्तिकेय युद्ध के देवता जिन्हें ‘कुमार’ और ‘स्कन्द’ के नाम से भी जानते हैं | मंगल ग्रह से उनका सम्बन्ध जोड़ा जाता है | महाभारत और रामायण में उन्हें शिव या रूद्र का पुत्र कहा गया है | पुत्र ऐसा जिसकी कोई माता नहीं थी | पौराणिक परंपरा के अनुसार शिव ने अपना वीर्य अग्नि में डाल दिया था जिसे गंगा ने स्वीकार किया तो कार्तिकेय की उत्पत्ति हुई | इसीलिए उन्हें अग्निभू और गंगापुत्र भी कहते हैं | जन्मोपरांत छह कृत्तिकाओं ने स्तनपान द्वारा उन्हें संपुष्ट किया जिससे उनके छह मस्तक बने इसलिए इन्हें ‘षष्मुख’ और ‘कार्तिकेय’ के नाम से जाना गया | मंगल को काल पुरुष का पराक्रम माना गया है जो कर्म (क्रिया) के फलस्वरुप ही प्राप्त होता है |


·       वर्ण-लाल

·       स्वरुप-कृशकाय

·       आकृति-चतुष्कोण

·       तत्व-अग्नि

·       स्वभाव-उग्र व कामुक

·       प्रकृति-पित्त

·       गोत्र-भारद्वाज

·       वाहन-मेढ़ा

·       राज्याधिकार-सेनापति

·       शरीर में प्रभाव-पेट से पीठ तक

·       उपरत्न-लाल अकीक

·       पराभव-शनि से पराजित

·       संज्ञा-पापी,अशुभ

·       रूचि-शस्त्रविद्या

·       भाग्योदय काल-२८ से ३२ वर्ष तक

·       जड़ी-अनंतमूल

·       दान पदार्थ-मूंगा,गेहूँ,मसूर,लाल बैल,गुड,स्वर्ण,तांबा,लाल वस्त्र व कनेर के लाल फूलादि

·       अवस्था-तरुण

·       लिंग-पुरुष

·       गुण-तम

·       स्वाद-तीखा

·       धातु-तांबा (मतान्तर से स्वर्ण)

·       जाति-क्षत्रिय

·       वार-मंगलवार

·       समिधा-खदिर (खैर अर्थात् कत्था की लकड़ी)

·       ऋतु-ग्रीष्म

·       कद-छोटा

·       रत्न-मूंगा

·       निसर्गबल-शनि से अधिक बली

·       बली-रात्रि में

·       क्रीड़ास्थल-दग्धा भूमि  

·       स्थान-पर्वत या अरण्य

·       दोषशमन-राहु, बुध और शनि का

·       शुभाशुभ-अशुभ

·       दान का समय-प्रातः सूर्योदय से ४८ मिनट तक

·       भाग-x

·       विचारणीय विषय-पराक्रम, रोग, भाई, भूमि व शत्रु आदि

·       विद्या-शस्त्र विज्ञान, युद्ध शास्त्र सैन्य-विज्ञान

·       दीप्तांश-८ अंश

·       द्रष्टि-उर्ध्व

·       शरीर में कारक- मांस व मज्जा

·       कालसमय-दिन

·       मंडल-त्रिकोण

·       देश-अवंति

·       देवता-स्कन्द (कार्तिकेय)

·       स्वामी-मेष,वृश्चिक राशि का

·       रोग-पित्तविकार, जलना-गिरना, गुप्तरोग, शिरशूल, सूखारोग, रक्तविकार, उदरविकार, एपिन्डी-साइटीज, चोट-चपेट, दुर्घटनादि   

·       दिशा-दक्षिण

·       शुष्कता-शुष्क

·       राशिभोगावधि-डेढ़ मास  



बुध ग्रह-



 सौर परिवार का सबसे लघु और चमकदार ग्रह बुध सूर्य के अत्यंत निकट है |यह सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले आकाश में दृष्टिगोचर होता है | बुध ग्रह सूर्य से अधिकतम २८ अंश दूर तक जा सकता है | सूर्य का निकटवर्ती ग्रह होने के कारण इसे सूर्य का सहायक कहते है | ब्रहस्पति की पत्नी तारा को उनके शिष्य सोम (चंद्रमा) हर ले गए थे जिस कारण तारकमय युद्ध हुआ | सोम का पक्ष उशना रूद्र तथा दानवों ने ले लिया तथा ब्रहस्पति का इंद्र आदि देवताओं ने | इस प्रकार जब इस देवासुर संग्राम ने उग्र रूप धारण कर लिया तो पृथ्वी को भी विचलित कर दिया तब उसने ब्रम्हा से युद्ध का अन्त करवाने की प्रार्थना को भी विचलित कर दिया | ब्रम्हा ने बीच-बचाव कर तारा को उसके पति ब्रहस्पति को लोटा दिया | इसी बीच तारा का एक पुत्र हुआ था उसे ब्रहस्पति और चन्द्र दोनों ने अपना-अपना पुत्र बताया | लेकिन जब ब्रम्हा ने तारा को बाध्य किया तो उसने रहस्य का उद्घाटन किया की वह सोम का पुत्र है | आगे चलकर उसका नाम इंदुसुत अर्थात् बुध पड़ा जो अपने नामानुरूप ग्रह कहलाया | बुध ने पौराणिक परम्परा के अनुसार, वैवस्वत मनु की कन्या इला से विवाह किया जिससे पुरूरवा नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ | इसीलिए पुरुरवा का एक नाम ऐल भी पड़ा | पुरुरवा ने सौ से भी ज्यादा अश्वमेध-यज्ञ किये थे | ऋग्वेद के एक सूक्त का ऋषि भी बुध को बताया गया है |बुध को काल पुरुष की वाणी और बुद्धि माना गया है |





·      वर्ण-हरा

·      स्वरुप-प्रसन्न

·      आकृति-गोल (क्षीण शरीर)

·      तत्व-पृथ्वी

·      स्वभाव-मिश्रित

·      प्रकृति-सोना

·      गोत्र-अत्रि

·      वाहन-सिंह

·      राज्याधिकार-राजकुमार

·      शरीर में प्रभाव-हाथ-पैरों में

·      उपरत्न-हरा मरगज, हरा ओनेक्स, हरि तुरमुली, पैरी डाट

·      पराभव-शुक्र से पराजित

·      संज्ञा-अकेला शुभ, पापयुत या दृष्ट होने पर अशुभ

·      रूचि-अर्थशास्त्र, लेखाशास्त्र अर्थववेद, गणित, शिल्पकला रसायन शास्त्र आदि

·      भाग्योदय काल-३२ से ३६ वर्ष तक

·      जड़ी-विधार की जड़

·      दान पदार्थ-हरा, नीला वस्त्र, अशुभ सोना, चाँदी, कांसा, मूंगा, गौ, पुष्प, दासी, हाथीदांत, घी, शक्कर, कपूर 

·      अवस्था-कुमार

·      लिंग-नपुंसक

·      गुण-राजसिक

·      स्वाद-मिश्रित

·      धातु-सोना

·      जाति-शूद्र

·      वार-बुधवार

·      समिधा-अपामार्ग (चिरचिटा) कटींले फूलों वाला कुरूप पौधा झाड़-झंकाड़ के रूप में सर्वत्र पाया जाता है | वर्षा ऋतु में उगकर गर्मी तक रहता है 

·      ऋतु-शरद

·      कद-सामान्य

·      रत्न-पन्ना

·      निसर्गबल-मंगल से अधिक बली

·      बली-पूर्वाह्न (प्रातःकाल से दोपहर तक का समय)

·      क्रीड़ास्थल-खेल का मैदान या क्रीड़ा भवन

·      स्थान-श्मशान, विद्वानों का घर या गाँव

·      दोषशमन-राहु का

·      शुभाशुभ-अकेला शुभ, अशुभ ग्रह युत या दृष्ट होने पर

·      दान का समय-सूर्योदय से २ घंटे तक

·      भाग-x

·      विचारणीय विषय-विद्या, बंधु, मामा, विवेक, मित्र व वाणिज्यादि   

·      विद्या-शिल्पकला, अर्थशास्त्र, रसायनशास्त्र, लेखाशास्त्र एवं वैदिक साहित्य आदि

·      दीप्तांश-७ अंश

·      दृष्टि-कटाक्ष

·      शरीर में कारक-त्वचा

·      काल समय-ऋतु

·      मंडल-बाणाकार  

·      देश-मगध

·      देवता-विष्णु

·      स्वामी-मिथुन व कन्या राशि

·      रोग-वात-पित्त, कफ विकार, चर्मरोग, कर्णरोग, कुष्ठ रोग, घुटनों में दर्द, मूत्ररोग, गला एवं वाणी दोष  

·      दिशा-उत्तर

·      शुष्कता-जलीय

·      राशिभोगावधि-एक मास (स्थूलतः  २१ से ३० दिन तक)

गुरु ग्रह-


सौर परिवार का वृहद् और ज्वलन्त ग्रह गुरु गौर से देखने पर पीला प्रतीत होता है| गुरु को बृहस्पति भी कहा जाता है| बृहस्पति ग्रह को देवताओं का गुरु होने का गौरव प्राप्त है| गुरु ग्रह देवगुरु के रूप में अपनी विदत्ता, ज्ञान, तेज, प्रतिभा, सम्मान और व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध है| कर्दम ऋषि की तीसरी पुत्री श्रद्धा का विवाह अंगिरा ऋषि के साथ हुआ था| उन्हीं के गर्भ से गुरु ग्रह का जन्म हुआ है| गुरु ग्रह देवताओं के गुरु माने जाते है| पुराणों के अनुसार गुरु ग्रह की स्थिति मंगल से ऊपर दो लाख योजन की दूरी पर है| यदि यह ग्रह वक्री न हो तो एक राशि को एक वर्ष में भोग लेता है|

गुरु ग्रह को कालपुरुष की त्वचा माना जाता है|  वक्ष स्थल पर इसका विशेष प्रभाव रहता है| इसके सम्बन्ध में कुछ तथ्य निम्नलिखित है-
·      वर्ण –पीत
·      आकृति-गोल
·      तत्व- आकाश
·      स्वभाव- मृदु 
·      प्रकृति- वात-पित्त-कफ
·      गोत्र- अंगिरा
·      वार- गुरुवार
·      राज्याधिकार-राजगुरु
·       शरीर में प्रभाव-कमर व जांघ  
·      उपरत्न- सुनहला, पीला ओनेक्स, पीला हकीक
·      संज्ञा- शुभ
·      क्रीड़ास्थल- भंडारगृह 
·      रूचि- वेदाभ्यास, वेदांत, दर्शन, व्याकरण व भाषाशास्त्र
·      भाग्योदय काल- १६ से २२ वर्ष तक
·      जड़ी- भारंगी या केले का मूल
·      दान का समय- संध्याकाल 
·      मंडल- दीर्घ, चतुरस्त्र
·      भाग- उभय
·      विचारणीय विषय- बुद्धि, धन
·      विद्या- व्याकरण, भाषा विज्ञान व वेद
·      दीप्तांश-९ अंश  
·      दिशा- ईशान
·      अवस्था-वृद्ध
·       लिंग- पुरुष
·      गुण- सत्व
·      स्वाद- मीठा
·      धातु- स्वर्ण
·      जाति-ब्राम्हण
·      वाहन- हाथी
·      समिधा- पीपल की लकड़ी
·      ऋतु- हेमन्त
·      कद- मध्यम या ह्रस्व
·      रत्न- पुखराज
·      निसर्गबल-शुक्र से कम बली
·       पराभव-मंगल से पराजित  
·      स्थान- ग्रामभूमि
·      दोष शमन-राहु, बुध, शनि, मंगल और शुक्र का  
·      शुभाशुभ-शुभ
·      दान पदार्थ-शक्कर,हल्दी,अश्व
·       देश-सिन्धु
·      देवता-ब्रम्हा(मतान्तर से इन्द्र)
·      स्वामी-धनु व मीन राशि का
·       रोग-वायु-कफ विकार, मुखरोग, फाइलेरिया, सूजन, नितम्ब एवं पैरों में पीड़ा, स्थूलता, दुर्बलता, कमरदर्द एवं कब्ज आदि
·      द्रष्टि-सम
·      शरीर में कारक-वसा व कफ  
·      शुष्कता-मधुर
·      राशिमोगावधि- तेरह मास
·      कालसमय- मास
  
  

शुक्र ग्रह-
        सौर परिवार का सबसे चमकीला ग्रह शुक्र दूरबीन से देखने पर सफ़ेद प्रतीत होता है| शुक्र महर्षि भृगु के पुत्र हैं| जो दैत्यों और राजा बलि के गुरू बने| उनकी पत्नी का नाम सुषुमा और पुत्री का नाम देवयानी था| देवयानी का विवाह चंद्रवंशी राजा ययाति के साथ हुआ पर उसके शर्मिष्ठा से पति-पत्नी सम्बन्ध हो जाने से शुक्र ने शाप द्वारा उसे जराग्रस्त कर दिया| हरिवंश पुराण की कथा है कि शुक्र ने शिव के पास जाकर पूछा कि असुरों की देवों से रक्षा और ईश्वर विजय का क्या उपाय है| उन्होंने हजारों वर्षों तक तप किया| इसी बीच देवों और दैत्यों में युद्ध छिड़ गया और विष्णु ने शुक्र की माता को मार डाला| इस पर शुक्र ने विष्णु को शाप दिया कि वे पृथ्वीं पर सात बार मनुष्य रूप में जन्म लें| शुक्र ने अपनी माता को फिर से जीवित कर लिया क्योंकि वे संजीवनी विद्या के ज्ञाता थे| यह विद्या उन्होंने देवयानी के माध्यम से यच को सिखायी थी| शिव के वरदान के लिए उन्होंने हजारों वर्षों से भी अधिक वर्षों तक तप किया| इंद्र ने तप को भंग करने के लिए अपनी पुत्री जयंती को उनके पास भेजा, लेकिन शुक्र ने अपना जप पूर्ण किया और फिर जयंती को ब्याहा| शुक्र का और एक नाम उशना या उशनस् भी है| शुक्र का राजनीतिक ज्ञान इतना मान्य है कि अनेक ग्रंथो में उनके मतों की चर्चा होती है| शुक्रनीति नामक विशिष्ट ग्रन्थ के तो वे रचयिता माने जाते हैं, यद्यपि उसके अनेक अंश १५वीं सदी में लिखे गए हैं| एक किवदंती प्रसिद्ध है कि वामन वेष धरकर विष्णु (वामन) जब दैत्यराज बलि को छलने गए, उस समय राजा बलि दान का संकल्प न कर पायें| इस अभीष्ट से वे जल की झारी (गंगासागर) की टोंटी के छिद्र में घुस गए थे| विष्णु (वामन) ने उन्हें पहचान लिया और झारी के छेद में कुश डाल दिया जिस कारण उसमे छिपे शुक्र की एक आँख नष्ट हो गयी, तभी से वे काने हैं|  
·       वर्ण-चितकबरा सफेद
·       स्वरुप-तेजस्वी घुंगराले श्याम केश युक्त
·       गुण-रज
·       स्वाद-खट्टा
·       धातु-चाँदी
·       जाति-ब्राम्हण
·       वार-शुक्रवार 
·       समिधा-गूलर की लकड़ी
·       ऋतु-बसन्त
·       शरीर में प्रभाव-जननांगों पर अर्थात् शिश्न से वृषण तक
·       उपरत्न-ओपल,स्फटिक,सफ़ेद जिरकान
·       संज्ञा-शुभ
·       क्रीड़ास्थल-शयनकक्ष
·       अवस्था-युवा किशोर
·       लिंग-स्त्री
·       आकृति-खण्ड
·       तत्व-जल
·       स्वभाव-लघु व मृदु
·       प्रकृति-कफ
·       गोत्र-भार्गव
·       वाहन-अश्व
·       राज्याधिकार-गुप्त मंत्री या प्रधान नायिका
·       कद-ह्रस्व (छोटा)
·       रत्न-हीरा
·       निसर्गबल-चन्द्र से कम बली
·       पराभव-चन्द्र से पराजित
·       बली-सायंकाल में
·       स्थान-जलभूमि
·       रूचि-ललित कलाएँ
·       भाग्योदय-२५ से २८ वर्ष तक
·       शुभाशुभ-शुभ
·       दानपदार्थ-छींट के वस्त्र, श्वेत अश्व, सवत्सा गो, चाँदी, सोना, चावल, सुगन्धित पद
·       देश-भोजकट
·       देवता-देवी, इन्द्राणी
·       स्वामी-वृष व तुला राशि का
·       रोग-कफ व वात विकार, वीर्य विकार, गुप्त रोग, प्रमेह, मधुमेह धातुक्षय, उदारविकार, मूत्ररोग एवं नेत्ररोग आदि
·       दिशा-आग्नेय पूर्व
·       शुष्कता-अम्लीय
·       राशि भोगावधि-एक मास 
·       दोष शमन-राहु, बुध, शनि और मंगल
·       जड़ी-सरपंखा मूल
·       दान का समय-सूर्योदय काल
·       मंडल-षटकोण
·       भाग-शीर्ष
·       विचारणीय विषय-स्त्री, वाहन, आभूषण, व्यापार एवं सुख
·       विद्या-चित्रकला, ललितकलाएँ, शिल्प, पेंटिंग, चिकित्साशास्त्र आदि
·       दीप्तांश-7 अंश
·       दृष्टि-कटाक्ष
·       शरीर में कारक-वीर्य व ओज
·       कालसमय-पक्ष   


 

1 टिप्पणी:

  1. नवग्रह का पूजन बहुत ही शुभ माना जाता है. नवग्रह की पूजा के बाद आप शिवजी की पूजा कर सकते हैं.

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